JNVU B.A. 1st Year Indian Philosophy – Chapter 1
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अध्याय–1
भारतीय दर्शन: अर्थ, स्वरूप, प्रश्न और दार्शनिक परंपराओं की आधारभूमि
1.1 प्रस्तावना
मनुष्य केवल जीवन जीता ही नहीं है; वह अपने जीवन, अपने अस्तित्व और अपने चारों ओर फैले जगत को समझना भी चाहता है। अनुभव के साथ उसके भीतर जिज्ञासा उत्पन्न होती है और जिज्ञासा से प्रश्न।
वह पूछता है–
मैं कौन हूँ?
मेरा अस्तित्व क्या है?
यह जगत क्या है?
जगत का मूल क्या है?
जो कुछ दिखाई देता है, क्या वही अंतिम सत्य है?
सत्य क्या है?
ज्ञान क्या है?
सही ज्ञान की पहचान कैसे हो?
आत्मा क्या है?
क्या ईश्वर का अस्तित्व है?
मनुष्य दुःख का अनुभव क्यों करता है?
कर्म और उसके परिणाम का क्या संबंध है?
मृत्यु क्या जीवन का अंत है?
यदि मनुष्य बंधन में है, तो मुक्ति क्या है और वह कैसे संभव है?
इन प्रश्नों का उत्तर केवल परंपरा, विश्वास या व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर दिया जा सकता है। किंतु जब मनुष्य इन प्रश्नों को तर्क, विवेक, प्रमाण, अनुभव और व्यवस्थित चिंतन के माध्यम से समझने का प्रयास करता है, तब दर्शन का आरम्भ होता है।
इस अर्थ में भारतीय दर्शन किसी एक व्यक्ति, किसी एक ग्रंथ अथवा किसी एक अंतिम मत का नाम नहीं है। यह मनुष्य की उस दीर्घ बौद्धिक और अस्तित्वगत यात्रा का नाम है जिसमें वह प्रश्न करता है, तर्क करता है, विभिन्न संभावनाओं की परीक्षा करता है और सत्य को समझने का प्रयास करता है।
भारतीय दर्शन की विशेषता यह है कि यहाँ समान प्रश्नों के अनेक उत्तर विकसित हुए। किसी ने प्रत्यक्ष जगत को प्राथमिकता दी, किसी ने आत्मा को, किसी ने पुरुष और प्रकृति को, किसी ने ब्रह्म को और किसी ने स्थायी आत्मा की धारणा को ही अस्वीकार किया।
इसलिए भारतीय दर्शन को समझने के लिए केवल यह जानना पर्याप्त नहीं कि किस दर्शन ने क्या कहा; यह समझना भी आवश्यक है कि उसने ऐसा क्यों कहा और उसके सामने कौन-सा दार्शनिक प्रश्न था।
1.2 दर्शन: प्रश्न से प्रारम्भ होने वाली ज्ञान-यात्रा
दर्शन का आरम्भ किसी निश्चित उत्तर को स्वीकार कर लेने से नहीं बल्कि प्रश्न करने से होता है।
मनुष्य जब अपने अनुभव को केवल अनुभव के रूप में न लेकर उसके आधार, कारण और अर्थ पर विचार करता है, तब दार्शनिक प्रश्न जन्म लेता है।
उदाहरण के लिए–
“मैं दुःखी हूँ।”
यह एक अनुभव है।
लेकिन–
दुःख क्या है?
दुःख क्यों उत्पन्न होता है?
क्या दुःख मानव जीवन का अनिवार्य अंग है?
क्या दुःख से पूर्णतः मुक्त हुआ जा सकता है?
ये दार्शनिक प्रश्न हैं।
इसी प्रकार–
“मैं संसार को देखता हूँ।”
यह सामान्य अनुभव है।
लेकिन–
संसार वास्तव में क्या है?
क्या संसार जैसा दिखाई देता है, वैसा ही है?
जिसे मैं संसार कहता हूँ, उसका ज्ञान मुझे कैसे प्राप्त होता है?
मेरे ज्ञान की विश्वसनीयता क्या है?
अब हम दर्शन के क्षेत्र में प्रवेश करते हैं।
इसलिए दर्शन की यात्रा को एक सूत्र में इस प्रकार समझा जा सकता है–
जिज्ञासा → प्रश्न → चिंतन → तर्क → अन्वेषण → बोध
दर्शन का उद्देश्य केवल प्रश्नों की संख्या बढ़ाना नहीं है। उसका उद्देश्य प्रश्नों को स्पष्ट, तार्किक और व्यवस्थित बनाना तथा उनके संभावित उत्तरों की आलोचनात्मक परीक्षा करना है।
1.3 ‘दर्शन’ शब्द का अर्थ
‘दर्शन’ शब्द संस्कृत की ‘दृश्’ धातु से बना है। ‘दृश्’ का सामान्य अर्थ है–देखना।
लेकिन दार्शनिक संदर्भ में देखना केवल इन्द्रियों से किसी वस्तु को देख लेना नहीं है।
यहाँ ‘देखना’ का अर्थ है–
वस्तु को उसके यथार्थ स्वरूप में समझने का प्रयास।
इसलिए दर्शन में केवल दृश्य का अवलोकन नहीं बल्कि–
- देखना,
- जानना,
- समझना,
- विचार करना,
- तर्क करना,
- परीक्षण करना और
- सत्य की खोज करना
शामिल है।
इस दृष्टि से–
दर्शन वह व्यवस्थित चिंतन है जिसके द्वारा मनुष्य सत्य, ज्ञान, अस्तित्व, जीवन और मूल्यों से संबंधित प्रश्नों को समझने तथा उनके यथार्थ स्वरूप की खोज करने का प्रयास करता है।
दर्शन केवल यह नहीं पूछता–
“क्या है?”
वह आगे पूछता है–
“क्यों है?”
“कैसे है?”
“हम इसे कैसे जानते हैं?”
“हमारा ज्ञान कितना विश्वसनीय है?”
“जो दिखाई देता है और जो वास्तव में है, उनमें क्या अंतर है?”
यहीं दर्शन अनुभव को चिंतन और चिंतन को दार्शनिक अन्वेषण में परिवर्तित करता है।
1.4 Philosophy का अर्थ
पाश्चात्य परंपरा में दर्शन के लिए प्रयुक्त शब्द Philosophy यूनानी मूल के दो शब्दों से संबंधित माना जाता है–
Philo – प्रेम या अनुराग
Sophia – प्रज्ञा या Wisdom
इस प्रकार Philosophy का शाब्दिक अर्थ है–
“प्रज्ञा के प्रति प्रेम” अथवा “ज्ञान के प्रति अनुराग।”
किन्तु Philosophy का दार्शनिक अर्थ केवल ज्ञान से प्रेम करना नहीं है। यह सत्य, ज्ञान, अस्तित्व, मनुष्य, जगत और मूल्यों से संबंधित मूलभूत प्रश्नों का तार्किक, आलोचनात्मक और व्यवस्थित अन्वेषण है।
इस प्रकार–
दर्शन – यथार्थ को देखने और समझने का प्रयास है।
Philosophy – प्रज्ञा की खोज का तर्कपूर्ण और आलोचनात्मक अन्वेषण है।
दोनों के केंद्र में एक समान मानवीय आकांक्षा दिखाई देती है–
वास्तविकता को समझना और जीवन के मूल प्रश्नों का विवेकपूर्ण समाधान खोजना।
1.5 दर्शन के मूल प्रश्न
दर्शन को उसके प्रश्नों के माध्यम से अधिक स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है।
1. अस्तित्व संबंधी प्रश्न
मैं कौन हूँ?
मनुष्य का वास्तविक स्वरूप क्या है?
जगत क्या है?
अस्तित्व का मूल क्या है?
2. ज्ञान संबंधी प्रश्न
ज्ञान क्या है?
सत्य ज्ञान और भ्रम में क्या अंतर है?
सही ज्ञान कैसे प्राप्त होता है?
ज्ञान के प्रमाण क्या हैं?
3. परमसत्ता संबंधी प्रश्न
क्या कोई परमसत्ता है?
क्या ईश्वर का अस्तित्व है?
यदि ईश्वर है तो उसका स्वरूप क्या है?
जगत और परमसत्ता का क्या संबंध है?
4. नैतिक प्रश्न
शुभ और अशुभ क्या है?
मनुष्य को कैसे जीना चाहिए?
कर्म का नैतिक मूल्य कैसे निर्धारित होता है?
5. दुःख और मुक्ति के प्रश्न
मनुष्य दुःखी क्यों है?
बंधन क्या है?
क्या दुःख का अंत संभव है?
मोक्ष या मुक्ति क्या है?
यदि मुक्ति संभव है तो उसका मार्ग क्या है?
यही प्रश्न भारतीय दर्शन की विभिन्न परंपराओं में अलग-अलग रूपों में सामने आते हैं।
1.6 भारतीय दर्शन का स्वरूप
भारतीय दर्शन किसी एक दार्शनिक मत का नाम नहीं है। यह अनेक परंपराओं, दृष्टियों, प्रमाण-पद्धतियों और सिद्धांतों का व्यापक संसार है।
भारतीय दर्शन में–
चार्वाक प्रत्यक्ष अनुभव और भौतिक जगत पर बल देता है।
जैन दर्शन अनेकान्तवाद के माध्यम से वास्तविकता को बहुआयामी रूप में समझने का प्रयास करता है।
बौद्ध दर्शन दुःख, प्रतीत्यसमुत्पाद और अनात्मवाद के माध्यम से अस्तित्व की समस्या का विश्लेषण करता है।
सांख्य पुरुष और प्रकृति के संबंध तथा तत्त्वों की व्याख्या करता है।
योग चित्तवृत्तियों के निरोध और साधना के माध्यम से मुक्ति की दिशा प्रस्तुत करता है।
न्याय प्रमाण, तर्क और यथार्थ ज्ञान की समस्या पर केंद्रित है।
वैशेषिक पदार्थों और जगत की संरचना का विश्लेषण करता है।
पूर्वमीमांसा वेद, धर्म और कर्म की दार्शनिक व्याख्या करती है।
वेदान्त ब्रह्म, जीव, जगत और मोक्ष के प्रश्नों का व्यापक विवेचन करता है।
इसलिए भारतीय दर्शन के बारे में अधिक उचित रूप से कहा जा सकता है–
भारतीय दर्शन एक मत नहीं बल्कि अनेक दार्शनिक दृष्टियों के बीच चलने वाला विस्तृत संवाद है।
इस संवाद में सहमति भी है और गहरा मतभेद भी।
1.7 भारतीय दर्शन की सामान्य विशेषताएँ
भारतीय दर्शन के विभिन्न मतों में मूलभूत अंतर हैं। फिर भी उनकी व्यापक चिंतन-भूमि में कुछ प्रमुख प्रश्न और प्रवृत्तियाँ दिखाई देती हैं।
1. सत्य की खोज
भारतीय दर्शन का मूल प्रयत्न सत्य को समझना है। यह सत्य बाह्य जगत, आत्मा, परमसत्ता अथवा जीवन के अंतिम स्वरूप से संबंधित हो सकता है।
2. ज्ञान की समस्या
सही ज्ञान क्या है?
और–
सही ज्ञान कैसे प्राप्त होता है?
यह प्रश्न भारतीय दर्शन में अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है।
3. आत्मा और जीव की समस्या
क्या आत्मा है?
यदि है तो उसका स्वरूप क्या है?
क्या वह स्थायी है?
जीव और आत्मा का क्या संबंध है?
इन प्रश्नों के उत्तर विभिन्न दर्शनों में भिन्न हैं।
4. जगत की समस्या
जगत क्या है?
उसका मूल क्या है?
क्या वह वास्तविक है?
उसका चेतना या परमसत्ता से क्या संबंध है?
5. कर्म की समस्या
मनुष्य के कर्मों का क्या परिणाम होता है?
कर्म और नैतिक जीवन का क्या संबंध है?
6. दुःख की समस्या
मानव जीवन में दुःख की उपस्थिति एक महत्वपूर्ण दार्शनिक समस्या रही है–
दुःख क्यों है?
उससे मुक्ति कैसे हो?
7. मोक्ष की समस्या
अनेक भारतीय दार्शनिक परंपराओं में मुक्ति या मोक्ष महत्वपूर्ण विषय रहा है, यद्यपि उसके स्वरूप और साधन के संबंध में मतभेद हैं।
8. तर्क और प्रमाण
भारतीय दर्शन केवल विश्वास पर आधारित चिंतन नहीं है। विभिन्न परंपराओं ने प्रमाण, तर्क, अनुभव और ज्ञान के साधनों का सूक्ष्म विवेचन किया।
9. जीवन से संबंध
भारतीय दर्शन केवल सैद्धांतिक चिंतन तक सीमित नहीं रहा। ज्ञान, आचरण, साधना, नैतिकता और मुक्ति के प्रश्नों के माध्यम से उसका संबंध जीवन से जुड़ा रहा।
10. वैचारिक विविधता
भारतीय दर्शन में भौतिकवाद से लेकर आध्यात्मिक चिंतन तक, अनेकान्तवाद से लेकर अनात्मवाद तक, अनेक प्रकार की दार्शनिक दृष्टियाँ विकसित हुईं।
यही उसकी व्यापकता का प्रमाण है।
1.8 भारतीय दर्शन का आस्तिक–नास्तिक विभाजन
भारतीय दर्शन का एक प्रसिद्ध वर्गीकरण है–
आस्तिक दर्शन
और
नास्तिक दर्शन
लेकिन यहाँ ‘आस्तिक’ और ‘नास्तिक’ शब्दों को सावधानी से समझना आवश्यक है।
सामान्य बोलचाल में–
आस्तिक = ईश्वर को मानने वाला
और–
नास्तिक = ईश्वर को न मानने वाला
समझा जाता है।
लेकिन भारतीय दार्शनिक वर्गीकरण में इसका प्रमुख आधार वेद की प्रामाणिकता की स्वीकृति या अस्वीकृति है।
अर्थात् मूल प्रश्न है–
“क्या वेद को प्रमाण अथवा प्रामाणिक ज्ञान-स्रोत के रूप में स्वीकार किया जाता है?”
इसी आधार पर भारतीय दर्शन की परंपराओं को आस्तिक और नास्तिक वर्गों में रखा गया।
यह अंतर बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि–
आस्तिक–नास्तिक और ईश्वरवादी–अनीश्वरवादी एक ही वर्गीकरण नहीं हैं।
1.9 आस्तिक दर्शन
जो दार्शनिक परंपराएँ वेद की प्रामाणिकता स्वीकार करती हैं, उन्हें परंपरागत रूप से आस्तिक दर्शन कहा जाता है।
इनमें छह प्रमुख दर्शन हैं–
- न्याय
- वैशेषिक
- सांख्य
- योग
- पूर्वमीमांसा
- वेदान्त
निर्धारित पाठ्यक्रम में वेदान्त के अंतर्गत विशेष रूप से–
- शंकर का अद्वैत वेदान्त
- रामानुज का विशिष्टाद्वैत
का अध्ययन आगे निर्धारित है।
इन छह दर्शनों को सामान्यतः षड्दर्शन कहा जाता है।
1.10 नास्तिक दर्शन
जो दार्शनिक परंपराएँ वेद की प्रामाणिकता स्वीकार नहीं करतीं, उन्हें परंपरागत वर्गीकरण में नास्तिक दर्शन कहा जाता है।
प्रमुख नास्तिक दर्शन हैं–
- चार्वाक
- जैन
- बौद्ध
पाठ्यक्रम में इन्हीं तीन परंपराओं का क्रमशः अध्ययन निर्धारित है।
यहाँ पुनः ध्यान रखना आवश्यक है कि–
नास्तिक = केवल ईश्वर को न मानने वाला
ऐसा सरल अर्थ भारतीय दर्शन के इस तकनीकी वर्गीकरण को पूरी तरह स्पष्ट नहीं करता।
1.11 आस्तिक–नास्तिक विभाजन का दार्शनिक आधार
अब प्रश्न उठता है–
भारतीय दर्शन में आस्तिक और नास्तिक का विभाजन क्यों किया गया?
इस प्रश्न का संबंध भारतीय दर्शन में प्रमाण और ज्ञान की प्रामाणिकता से है।
जब दार्शनिक यह पूछता है–
“सत्य का ज्ञान कैसे प्राप्त होगा?”
तो उसके सामने दूसरा प्रश्न भी आता है–
“किस ज्ञान-स्रोत को प्रमाण माना जाए?”
इसी संदर्भ में वेद की प्रामाणिकता का प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है।
इसलिए–
आस्तिक–नास्तिक विभाजन का प्रमुख आधार = वेद-प्रामाण्य
इसे इस प्रकार समझा जा सकता है–
| आधार | आस्तिक दर्शन | नास्तिक दर्शन |
| वेद की प्रामाणिकता | स्वीकार | स्वीकार नहीं |
| प्रमुख परंपराएँ | न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा, वेदान्त | चार्वाक, जैन, बौद्ध |
| वर्गीकरण का मूल आधार | वेद-प्रामाण्य | वेद-प्रामाण्य का अस्वीकार |
अतः–
आस्तिक–नास्तिक का दार्शनिक वर्गीकरण मुख्यतः वेद की प्रमाणिकता से संबंधित है, न कि केवल ईश्वर की स्वीकृति या अस्वीकृति से।
1.12 आस्तिकता और ईश्वरवाद: एक महत्वपूर्ण अंतर
यहाँ एक सूक्ष्म दार्शनिक अंतर समझना आवश्यक है।
यदि–
आस्तिक = ईश्वरवादी
और–
नास्तिक = ईश्वर-विरोधी
मान लिया जाए, तो भारतीय दर्शन की वास्तविक संरचना ठीक से समझ में नहीं आएगी।
उदाहरण के लिए, पारंपरिक सांख्य दर्शन को आस्तिक दर्शन माना जाता है, लेकिन उसके शास्त्रीय तत्त्वमीमांसात्मक ढाँचे में ईश्वर को अनिवार्य तत्त्व के रूप में स्थापित नहीं किया जाता।
इससे स्पष्ट होता है कि–
वेद-प्रामाण्य का प्रश्न और ईश्वरवाद का प्रश्न अलग-अलग दार्शनिक स्तरों पर स्थित हैं।
इसलिए परीक्षा में यह लिखना अधिक उचित होगा–
“भारतीय दर्शन में आस्तिकता का मुख्य आधार वेद की प्रामाणिकता की स्वीकृति है; इसे मात्र ईश्वरवाद के अर्थ में नहीं लेना चाहिए।”
1.13 भारतीय दर्शन की प्रमुख परंपराएँ: प्रारंभिक परिचय
अब उन दार्शनिक परंपराओं का संक्षिप्त परिचय आवश्यक है जिनका विस्तृत अध्ययन आगे किया जाएगा।
1. न्याय
न्याय दर्शन का प्रमुख केंद्र है–
प्रमाण, तर्क और यथार्थ ज्ञान।
यह प्रश्न करता है–
सही ज्ञान क्या है और उसे प्राप्त करने के विश्वसनीय साधन कौन-से हैं?
2. वैशेषिक
वैशेषिक दर्शन का प्रमुख विषय है–
पदार्थों का विश्लेषण और जगत की संरचना।
यह वस्तुओं और उनके मूलभूत वर्गों का विश्लेषण करता है।
3. सांख्य
सांख्य दर्शन का केंद्रीय प्रश्न है–
पुरुष और प्रकृति का संबंध क्या है?
यह जगत और अनुभव की व्याख्या के लिए तत्त्वों की व्यवस्थित योजना प्रस्तुत करता है।
4. योग
योग दर्शन चित्त और उसकी वृत्तियों के प्रश्न को केंद्र में रखता है।
इसकी दार्शनिक-साधनात्मक दिशा को संक्षेप में–
चित्तवृत्ति-निरोध और मुक्ति की ओर साधना
के रूप में समझा जा सकता है।
5. पूर्वमीमांसा
पूर्वमीमांसा का प्रमुख संबंध–
वेद, धर्म और कर्म
की दार्शनिक व्याख्या से है।
6. वेदान्त
वेदान्त में प्रमुख प्रश्न हैं–
ब्रह्म क्या है?
जीव क्या है?
जगत क्या है?
इनका परस्पर संबंध क्या है?
मोक्ष क्या है?
इसके विभिन्न आचार्यों ने इन प्रश्नों के अलग-अलग उत्तर दिए।
7. चार्वाक
चार्वाक दर्शन को भारतीय भौतिकवादी परंपरा के रूप में समझा जाता है। इसमें प्रत्यक्ष को प्रमुख प्रमाण माना जाता है और जगत की व्याख्या भौतिक आधार पर की जाती है।
8. जैन दर्शन
जैन दर्शन में प्रमुख प्रश्न हैं–
जीव–अजीव क्या हैं?
वास्तविकता को क्या एक ही दृष्टि से जाना जा सकता है?
इसके संदर्भ में आगे–
अनेकान्तवाद, स्याद्वाद और नयवाद
का अध्ययन किया जाएगा।
9. बौद्ध दर्शन
बौद्ध दर्शन में प्रमुख प्रश्न हैं–
दुःख क्यों है?
उसकी उत्पत्ति कैसे होती है?
क्या स्थायी आत्मा आवश्यक है?
अस्तित्व का स्वरूप क्या है?
आगे इसके अंतर्गत–
चार आर्य सत्य, प्रतीत्यसमुत्पाद, क्षणिकवाद और अनात्मवाद
का अध्ययन किया जाएगा।
1.14 भारतीय दर्शन: मतभेद में भी दार्शनिक संवाद
भारतीय दर्शन को यदि केवल नौ परंपराओं की सूची के रूप में पढ़ा जाए, तो उसका वास्तविक दार्शनिक स्वरूप समझ में नहीं आएगा।
प्रत्येक दर्शन किसी न किसी मूल प्रश्न को केंद्र में रखकर अपना चिंतन विकसित करता है।
चार्वाक पूछता है–
ज्ञान का विश्वसनीय आधार क्या है?
जैन दर्शन पूछता है–
क्या वास्तविकता को केवल एक दृष्टि से पूर्णतः जाना जा सकता है?
बौद्ध दर्शन पूछता है–
क्या स्थायी आत्मा की धारणा आवश्यक है? दुःख कैसे उत्पन्न होता है?
सांख्य पूछता है–
चेतन पुरुष और प्रकृति का संबंध क्या है?
योग पूछता है–
चित्त की वृत्तियों और मुक्ति का क्या संबंध है?
न्याय पूछता है–
यथार्थ ज्ञान की पहचान कैसे होगी?
वैशेषिक पूछता है–
जगत किन पदार्थों और तत्त्वों से निर्मित है?
मीमांसा पूछती है–
धर्म और वैदिक वाक्य की प्रामाणिकता को कैसे समझा जाए?
वेदान्त पूछता है–
ब्रह्म, जीव और जगत का अंतिम संबंध क्या है?
इस प्रकार भारतीय दर्शन में मतभेद केवल विरोध नहीं हैं; वे दार्शनिक संवाद की प्रक्रिया को जन्म देते हैं।
1.15 भारतीय दर्शन को कैसे पढ़ें?
भारतीय दर्शन के अध्ययन में केवल यह याद करना पर्याप्त नहीं–
किस दर्शन ने क्या माना?
इसके साथ चार प्रश्न हमेशा पूछे जाने चाहिए–
1. प्रश्न क्या था?
उस दार्शनिक परंपरा के सामने मूल समस्या क्या थी?
2. प्रमाण क्या था?
उसने सत्य को जानने के लिए किन साधनों को स्वीकार किया?
3. तर्क क्या था?
उस निष्कर्ष तक पहुँचने के पीछे उसका दार्शनिक तर्क क्या था?
4. निष्कर्ष क्या था?
उसके सिद्धांत से अस्तित्व, ज्ञान, जीवन या मुक्ति के संबंध में क्या निष्कर्ष निकलता है?
इस प्रकार–
प्रश्न → प्रमाण → तर्क → सिद्धांत → निष्कर्ष
भारतीय दर्शन के अध्ययन की एक उपयोगी पद्धति बन जाती है।
1.16 भारतीय दर्शन: केवल आध्यात्मिक दर्शन नहीं
भारतीय दर्शन को कभी-कभी केवल आध्यात्मिकता, धर्म या मोक्ष से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन यह दृष्टि भारतीय दार्शनिक परंपरा की पूरी व्यापकता को व्यक्त नहीं करती।
भारतीय दर्शन में–
ज्ञानमीमांसा है,
तर्क है,
तत्त्वमीमांसा है,
नैतिक चिंतन है,
भौतिकवादी चिंतन है,
भाषा और प्रमाण की समस्या है,
और मुक्ति का प्रश्न भी है।
चार्वाक का भौतिकवादी दृष्टिकोण, न्याय का प्रमाण-तर्क, वैशेषिक का पदार्थ-विवेचन, जैन का अनेकान्तवाद और बौद्ध का अनात्मवाद यह स्पष्ट करते हैं कि भारतीय दर्शन का क्षेत्र अत्यंत व्यापक है।
इसलिए भारतीय दर्शन को केवल–
“मोक्ष का दर्शन”
कहना पर्याप्त नहीं होगा।
अधिक उचित है कि इसे–
सत्य, ज्ञान, अस्तित्व, जीवन, नैतिकता और मुक्ति से संबंधित विविध दार्शनिक प्रश्नों की भारतीय परंपरा
के रूप में समझा जाए।
1.17 भारतीय दर्शन की अंतर्धारा: ज्ञान और जीवन
भारतीय दर्शन में ज्ञान केवल सूचना प्राप्त करना नहीं है।
कई परंपराओं में ज्ञान का संबंध मनुष्य के जीवन, आचरण और मुक्ति से जोड़ा गया है।
इसलिए भारतीय दर्शन में यह प्रश्न महत्वपूर्ण है–
यदि सत्य का ज्ञान हो जाए, तो उससे मनुष्य के जीवन में क्या परिवर्तन होगा?
यहीं से ज्ञान और जीवन के बीच संबंध स्थापित होता है।
एक ओर दर्शन पूछता है–
सत्य क्या है?
दूसरी ओर पूछता है–
उस सत्य के ज्ञान के साथ मनुष्य को कैसे जीना चाहिए?
इसी कारण भारतीय दर्शन में ज्ञान, आचरण और मुक्ति के प्रश्न अनेक परंपराओं में परस्पर जुड़े हुए दिखाई देते हैं।
1.18 भारतीय दर्शन: विविधता में दार्शनिक एकाग्रता
भारतीय दर्शन में निष्कर्षों की विविधता बहुत व्यापक है।
एक ओर–
चार्वाक का भौतिकवाद
तो दूसरी ओर–
वेदान्त का ब्रह्मवाद।
एक ओर–
जैन अनेकान्तवाद
तो दूसरी ओर–
बौद्ध अनात्मवाद।
एक ओर–
सांख्य का पुरुष–प्रकृति द्वैत
तो दूसरी ओर–
वेदान्त के विभिन्न अद्वैत एवं विशिष्टाद्वैत प्रतिपादन।
इन मतभेदों के बावजूद एक साझा दार्शनिक प्रयत्न दिखाई देता है–
मनुष्य अपने अनुभव और जगत की वास्तविकता को किस प्रकार समझे?
यही प्रश्न भारतीय दर्शन को निरंतर आगे बढ़ाता है।
1.19 भारतीय दर्शन की आधारभूमि: एक समेकित दृष्टि
अब तक की चर्चा को एक क्रम में रखें तो भारतीय दर्शन की आधारभूमि इस प्रकार सामने आती है–
पहला चरण – अनुभव
मनुष्य जगत और जीवन का अनुभव करता है।
↓
दूसरा चरण – जिज्ञासा
अनुभव से उसके भीतर जानने की इच्छा उत्पन्न होती है।
↓
तीसरा चरण – प्रश्न
वह पूछता है–
मैं कौन हूँ?
जगत क्या है?
सत्य क्या है?
ज्ञान क्या है?
↓
चौथा चरण – प्रमाण
वह पूछता है–
सही ज्ञान का आधार क्या है?
↓
पाँचवाँ चरण – तर्क
वह संभावित उत्तरों की तार्किक परीक्षा करता है।
↓
छठा चरण – दार्शनिक सिद्धांत
विभिन्न परंपराएँ अपने-अपने निष्कर्ष प्रस्तुत करती हैं।
↓
सातवाँ चरण – जीवन और मुक्ति
अंततः प्रश्न उठता है–
इस ज्ञान का मनुष्य के जीवन से क्या संबंध है?
इसी क्रम में भारतीय दर्शन का विविध संसार विकसित होता है।
1.20 निष्कर्ष
भारतीय दर्शन मनुष्य की प्रश्नाकुल चेतना का व्यवस्थित और गंभीर रूप है। मनुष्य जब अपने अनुभवों से आगे बढ़कर जीवन, जगत, आत्मा, सत्य, ज्ञान, ईश्वर, कर्म, दुःख और मुक्ति के संबंध में मूल प्रश्न करता है, तब दार्शनिक चिंतन जन्म लेता है।
‘दर्शन’ में देखने का अर्थ केवल दृश्य को देखना नहीं बल्कि यथार्थ को समझने का प्रयास है। Philosophy में wisdom के प्रति प्रेम केवल ज्ञान-संग्रह नहीं बल्कि सत्य और वास्तविकता के मूल प्रश्नों का तार्किक एवं आलोचनात्मक अन्वेषण है।
भारतीय दर्शन किसी एक मत का नाम नहीं है। यह अनेक दार्शनिक परंपराओं का व्यापक संवाद है। इन्हीं परंपराओं को समझने के लिए आस्तिक और नास्तिक का वर्गीकरण किया गया, जिसका प्रमुख आधार वेद की प्रामाणिकता की स्वीकृति या अस्वीकृति है।
आस्तिक परंपराओं में–
न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, पूर्वमीमांसा और वेदान्त
तथा नास्तिक परंपराओं में–
चार्वाक, जैन और बौद्ध
को रखा जाता है।
लेकिन इन परंपराओं को केवल अलग-अलग मत मानना पर्याप्त नहीं है। प्रत्येक परंपरा किसी मूल प्रश्न का उत्तर खोजती है, किसी प्रमाण को स्वीकार करती है, किसी तर्क-पद्धति का उपयोग करती है और उससे एक विशिष्ट दार्शनिक निष्कर्ष तक पहुँचती है।
इसलिए भारतीय दर्शन का अध्ययन अंततः केवल यह जानना नहीं है कि–
“किस दर्शन ने क्या कहा?”
बल्कि यह समझना है कि–
“उसने ऐसा क्यों कहा, उसके सामने कौन-सा प्रश्न था, उसने किस प्रमाण को स्वीकार किया, उसका तर्क क्या था और उसके निष्कर्ष का दार्शनिक अर्थ क्या है?”
मूल दार्शनिक सूत्र
“जिज्ञासा से प्रश्न जन्म लेता है, प्रश्न से चिंतन, चिंतन से तर्क, तर्क से अन्वेषण और अन्वेषण से बोध की संभावना उत्पन्न होती है।”
और–
“भारतीय दर्शन एक मत नहीं बल्कि सत्य, ज्ञान, अस्तित्व और जीवन के प्रश्नों पर चलने वाला बहुविध दार्शनिक संवाद है।”
मानस जिले सिंह
【यथार्थवादी विचारक 】
अनुयायी – मानस पंथ, शिष्य – प्रोफेसर औतार लाल मीणा
उद्देश्य – मानवीय मूल्यों की स्थापना हेतु प्रकृति के नियमों का यथार्थ प्रस्तुतीकरण में संकल्पबद्ध योगदान देना।

