JNVU B.A. 1st Year Indian Philosophy – Chapter 2
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अध्याय 2
चार्वाक दर्शन: प्रत्यक्षवाद, भौतिकवाद और जीवन की यथार्थवादी दृष्टि
2.1 भूमिका: ज्ञान की समस्या से चार्वाक की शुरुआत
भारतीय दर्शन की यात्रा में पहला मौलिक प्रश्न है–:मनुष्य यथार्थ को कैसे जानता है?
यदि मनुष्य किसी वस्तु के बारे में ज्ञान प्राप्त करता है, तो यह प्रश्न उठता है कि उस ज्ञान की विश्वसनीयता का आधार क्या है। क्या जो कुछ इन्द्रियों से प्रत्यक्ष दिखाई या अनुभव किया जा सकता है, वही सत्य है? अथवा ऐसी वस्तुओं और तथ्यों का भी ज्ञान संभव है जो इस समय प्रत्यक्ष नहीं हैं?
यहीं से प्रमाण की समस्या उत्पन्न होती है।
चार्वाक दर्शन इस प्रश्न का अत्यन्त स्पष्ट और अनुभव-आधारित उत्तर देता है–:
प्रत्यक्ष ही प्रमाण है।
अर्थात् जो ज्ञान प्रत्यक्ष अनुभव से प्राप्त होता है, वही यथार्थ ज्ञान का विश्वसनीय आधार है।
यहाँ चार्वाक केवल किसी धार्मिक सिद्धान्त का विरोध नहीं करता बल्कि ज्ञान की पूरी पद्धति के सामने एक मूलभूत प्रश्न रखता है–:
यदि किसी वस्तु का प्रत्यक्ष अनुभव नहीं है, तो हम उसके अस्तित्व को निश्चित रूप से कैसे स्वीकार करें?
यही प्रश्न आगे चार्वाक द्वारा अनुमान, आत्मा, ईश्वर, पुनर्जन्म और परलोक के निषेध की दार्शनिक भूमि तैयार करता है।
2.2 प्रमाण की समस्या: ज्ञान कब विश्वसनीय है?
प्रमाण वह साधन है जिसके द्वारा यथार्थ ज्ञान उत्पन्न होता है।
न्याय दर्शन आगे चलकर प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द आदि को प्रमाण स्वीकार करेगा; परन्तु चार्वाक इस बहुलता को स्वीकार नहीं करता।
चार्वाक का मूल आग्रह है–:
जिसका ज्ञान प्रत्यक्ष अनुभव से नहीं हुआ, उसके बारे में निश्चित सत्य का दावा सावधानी के बिना नहीं किया जा सकता।
इस दृष्टि से चार्वाक का दर्शन मूलतः प्रत्यक्षवाद (Empiricism/Perceptionism) की दिशा में विकसित होता है।
इसका अर्थ यह नहीं कि मनुष्य कभी अनुमानात्मक विचार करता ही नहीं। दैनिक जीवन में मनुष्य अनुमान लगाता है; समस्या यह है कि क्या ऐसा अनुमान निश्चित और सार्वभौम प्रमाण हो सकता है?
यहीं से चार्वाक का सबसे महत्वपूर्ण तर्क-विवाद प्रारम्भ होता है।
2.3 प्रत्यक्ष ही प्रमाण
चार्वाक के अनुसार प्रत्यक्ष ही प्रमाण है।
प्रत्यक्ष वह ज्ञान है जो इन्द्रियों और उनके विषयों के प्रत्यक्ष सम्पर्क से उत्पन्न होता है।
जैसे–:
- आँख से वृक्ष दिखाई देना।
- कान से ध्वनि सुनाई देना।
- त्वचा से गर्मी या ठंडक का अनुभव होना।
- नाक से सुगंध का अनुभव होना।
- जिह्वा से स्वाद का अनुभव होना।
इन सभी में ज्ञान किसी प्रत्यक्ष अनुभव पर आधारित है।
इसलिए चार्वाक के लिए प्रत्यक्ष ज्ञान की विशेषता है–:
वस्तु → इन्द्रिय-संपर्क → अनुभव → ज्ञान
यहीं चार्वाक की ज्ञानमीमांसा का आधार निर्मित होता है।
2.4 अनुमान का प्रश्न: क्या अप्रत्यक्ष ज्ञान निश्चित हो सकता है?
अब कठिन प्रश्न सामने आता है।
मान लीजिए हम दूर पर्वत पर धुआँ देखते हैं। आग दिखाई नहीं देती, फिर भी हम कहते हैं–:
“पर्वत पर आग है।”
यहाँ आग प्रत्यक्ष नहीं है। आग का ज्ञान धुएँ के आधार पर प्राप्त हुआ है।
यही अनुमान है।
न्याय दर्शन इसी प्रकार के ज्ञान को प्रमाण मानेगा। लेकिन चार्वाक पूछता है–:
धुएँ को देखकर आग का ज्ञान निश्चित कैसे हुआ?
यहीं व्याप्ति की आवश्यकता सामने आती है।
2.5 व्याप्ति क्या है?
न्याय के अनुसार अनुमान तभी सम्भव है जब हेतु और साध्य के बीच एक निश्चित और अविनाभावी संबंध ज्ञात हो।
इसे व्याप्ति कहते हैं।
सरल रूप में–:
जहाँ-जहाँ धुआँ है, वहाँ-वहाँ आग है।
यहाँ–:
- पर्वत = पक्ष
- आग = साध्य
- धुआँ = हेतु
- धुआँ और आग का अनिवार्य संबंध = व्याप्ति
आपके व्याप्ति संबंधी दस्तावेज़ में भी यही आधार दिया गया है कि व्याप्ति हेतु और साध्य के बीच निश्चित, अविच्छिन्न और अनिवार्य सहचर्य-संबंध है।
इस प्रकार अनुमान की संरचना बनती है–:
पर्वत पर धुआँ है।
↓
जहाँ धुआँ है, वहाँ आग है।
↓
अतः पर्वत पर आग है।
लेकिन चार्वाक की आपत्ति यहीं से शुरू होती है।
2.6 चार्वाक की मूल आपत्ति: व्याप्ति का ज्ञान कैसे होगा?
चार्वाक का प्रश्न अत्यन्त गम्भीर है–:
हमने धुएँ और आग को कुछ स्थानों पर साथ देखा–:इससे यह कैसे सिद्ध हुआ कि हर स्थान, हर समय और हर परिस्थिति में जहाँ धुआँ होगा वहाँ आग अवश्य होगी?
उदाहरण के लिए हमने देखा–:
- रसोई में धुआँ है → आग है।
- चूल्हे में धुआँ है → आग है।
- अग्निकुण्ड में धुआँ है → आग है।
इन अनुभवों से एक सामान्य नियम बनाया गया–:
जहाँ धुआँ है, वहाँ आग है।
लेकिन चार्वाक पूछता है–:
क्या हमने संसार के प्रत्येक स्थान, प्रत्येक समय और प्रत्येक सम्भव परिस्थिति में धुआँ और आग का संबंध प्रत्यक्ष देखा है?
नहीं।
इसलिए सीमित प्रत्यक्ष अनुभव से सार्वभौम व्याप्ति स्थापित करना समस्या पैदा करता है।
यही चार्वाक की अनुमान-विरोधी स्थिति का मुख्य दार्शनिक आधार है।
2.7 अन्वय और व्यतिरेक: चार्वाक की आपत्ति को समझने की कुंजी
व्याप्ति को समझाने में न्याय परंपरा अन्वय और व्यतिरेक का प्रयोग करती है।
(क) अन्वय
जहाँ हेतु है, वहाँ साध्य है।
उदाहरण–:
जहाँ धुआँ है, वहाँ आग है।
रसोई में धुआँ है → आग है।
चूल्हे में धुआँ है → आग है।
यह सकारात्मक सहस्थिति (Positive Concomitance) है।
(ख) व्यतिरेक
जहाँ साध्य नहीं है, वहाँ हेतु भी नहीं है।
उदाहरण–:
जहाँ आग नहीं है, वहाँ धुआँ भी नहीं है।
जलाशय में आग नहीं है → वहाँ धुआँ भी नहीं है।
यह नकारात्मक सह-अभाव (Negative Concomitance) है।
इस प्रकार–:
अन्वय:
धुआँ है → आग है।
व्यतिरेक:
आग नहीं है → धुआँ नहीं है।
लेकिन चार्वाक फिर प्रश्न करता है–:
इन सकारात्मक और नकारात्मक उदाहरणों की संख्या कितनी भी क्यों न हो, वे सभी अनुभव किए हुए सीमित उदाहरण हैं। उनसे अज्ञात सभी परिस्थितियों के लिए सार्वभौम नियम कैसे सिद्ध हुआ?
यही चार्वाक की मूल चुनौती है।
2.8 केवल सहस्थिति से व्याप्ति सिद्ध नहीं होती
चार्वाक की आपत्ति को एक सरल उदाहरण से समझ सकते हैं।
मान लें किसी व्यक्ति ने अनेक बार देखा–:
जब मोर दिखाई दिए, तब वर्षा हुई।
क्या इससे वह यह निष्कर्ष निकाल सकता है–:
जहाँ मोर हैं, वहाँ वर्षा अवश्य होगी?
नहीं।
क्योंकि मोर और वर्षा के बीच अनिवार्य संबंध सिद्ध नहीं हुआ।
इसी प्रकार चार्वाक कहता है कि केवल यह देख लेना कि–:
धुआँ और आग साथ-साथ दिखाई देते हैं
व्याप्ति की सार्वभौमिक अनिवार्यता सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
इसलिए सहसंबंध (Correlation) और व्याप्ति (Invariable Relation) में अंतर है।
व्याप्ति केवल यह नहीं कहती–:
“अभी तक दोनों साथ दिखाई दिए हैं।”
वह कहती है–:
“जहाँ हेतु है, वहाँ साध्य का अभाव सम्भव नहीं है।”
यही अंतर अनुमान की दार्शनिक कठिनाई को गहरा बनाता है।
2.9 व्याप्ति और अनुमान का संबंध
अब चार्वाक की आपत्ति को अनुमान की पूरी प्रक्रिया से जोड़ना आवश्यक है।
न्याय की दृष्टि से प्रक्रिया है–:
पक्ष में हेतु का प्रत्यक्ष ज्ञान
↓
हेतु–साध्य की व्याप्ति का ज्ञान
↓
पक्ष में व्याप्त हेतु का परामर्श
↓
साध्य का अनुमान
अर्थात्–:
व्याप्तिज्ञान → परामर्श → अनुमान
आपके व्याप्ति दस्तावेज़ में भी यही क्रम स्पष्ट किया गया है।
इससे एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है–:
अनुमान केवल धुआँ देखने से नहीं होता।
धुआँ तो केवल हेतु का प्रत्यक्ष ज्ञान देता है।
अनुमान इसलिए होता है क्योंकि मन में पहले से यह ज्ञान है–:
धूमवान् स्थान अग्निवान् होता है।
इसलिए चार्वाक का वास्तविक प्रश्न है–:
यदि व्याप्ति ही निश्चित रूप से सिद्ध नहीं हुई, तो उस व्याप्ति पर आधारित अनुमान को निश्चित प्रमाण कैसे माना जाए?
यहीं चार्वाक अनुमान की प्रमाणता को चुनौती देता है।
2.10 व्याप्ति को अनुमान से सिद्ध करने की समस्या
चार्वाक की आपत्ति का दूसरा स्तर और अधिक सूक्ष्म है।
यदि कोई कहे–:
“हम व्याप्ति को अनुमान से सिद्ध कर सकते हैं।”
तो चार्वाक पूछेगा–:
स्वयं अनुमान को प्रमाणित करने के लिए व्याप्ति चाहिए और व्याप्ति को प्रमाणित करने के लिए अनुमान चाहिए–:तो यह चक्र कहाँ समाप्त होगा?
अर्थात्–:
अनुमान की प्रमाणता के लिए व्याप्ति आवश्यक है।
लेकिन यदि व्याप्ति को अनुमान से सिद्ध किया जाए, तो–:
व्याप्ति की प्रमाणता के लिए भी अनुमान आवश्यक हो जाएगा।
इससे अन्योन्याश्रय (Mutual Dependence) अथवा चक्र की समस्या उत्पन्न होती है।
यही कारण है कि चार्वाक के लिए अनुमान को स्वतंत्र और निश्चित प्रमाण स्वीकार करना कठिन है।
2.11 उपाधि की समस्या
व्याप्ति के संबंध में एक दूसरी कठिनाई उपाधि (Upādhi) की है।
कभी ऐसा हो सकता है कि दो घटनाएँ हमें नियमित रूप से साथ दिखाई दें, लेकिन उनके संबंध के पीछे कोई तीसरी आवश्यक शर्त छिपी हो।
यदि उस अतिरिक्त शर्त को हम न पहचानें और सीधे सार्वभौम नियम बना दें, तो अनुमान गलत हो सकता है।
इसलिए न्याय परंपरा व्याप्ति को केवल बार-बार साथ दिखाई देने वाली घटनाओं का संबंध नहीं मानती; वह यह भी देखती है कि कहीं कोई ऐसी उपाधि या सीमित करने वाली शर्त तो नहीं है जो संबंध को नियंत्रित कर रही हो।
यहीं से न्याय की अनुमान-पद्धति अधिक सूक्ष्म होती जाती है।
2.12 चार्वाक और न्याय: मूल दार्शनिक विवाद
| प्रश्न | चार्वाक | न्याय |
| प्रमाण | प्रत्यक्ष प्रमुख/एकमात्र प्रमाण | अनेक प्रमाण |
| अनुमान | स्वतंत्र निश्चित प्रमाण नहीं | प्रमाण |
| व्याप्ति | सार्वभौम निश्चितता संदिग्ध | अनुमान की अनिवार्य आधारशिला |
| अन्वय | सीमित अनुभव | व्याप्ति-ज्ञान में सहायक |
| व्यतिरेक | सार्वभौमिकता सिद्ध करने की समस्या | व्याप्ति-स्थापन में सहायक |
| मुख्य चिंता | प्रत्यक्ष से आगे कैसे जाएँ? | अप्रत्यक्ष का यथार्थ ज्ञान कैसे सम्भव है? |
इस प्रकार दोनों दर्शनों के बीच विवाद केवल “अनुमान मानना या न मानना” नहीं है।
असल विवाद है–:
क्या सीमित अनुभव से सार्वभौम और अनिवार्य ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है?
यही प्रश्न भारतीय ज्ञानमीमांसा में व्याप्ति की समस्या को अत्यन्त महत्वपूर्ण बनाता है।
2.13 चार्वाक का भौतिकवाद
ज्ञान की समस्या पर अपना दृष्टिकोण स्थापित करने के बाद चार्वाक अस्तित्व की समस्या की ओर बढ़ता है।
यदि प्रत्यक्ष ही प्रमाण है, तो हमें उस सत्ता को स्वीकार करने में प्राथमिकता देनी चाहिए जो प्रत्यक्ष अनुभव के संसार में उपलब्ध है।
इसलिए चार्वाक भौतिक जगत (Material World) को वास्तविक मानता है।
उसके अनुसार–:
- पृथ्वी
- जल
- अग्नि
- वायु
जैसे भौतिक तत्वों से संसार का निर्माण होता है।
चेतना को भी किसी स्वतंत्र, अमूर्त और शरीर से पृथक सत्ता के रूप में स्वीकार करने के स्थान पर चार्वाक उसे भौतिक संगठन से उत्पन्न मानने की दिशा में जाता है।
2.14 देहात्मवाद: शरीर ही आत्मा?
चार्वाक का एक प्रमुख सिद्धान्त देहात्मवाद है।
सामान्य अनुभव में हम कहते हैं–:
“मैं देखता हूँ।”
“मैं चलता हूँ।”
“मुझे सुख मिला।”
“मुझे दुःख हुआ।”
चार्वाक पूछता है–:
यह “मैं” शरीर से अलग कोई आत्मा क्यों माना जाए?
जब शरीर स्वस्थ होता है, चेतना स्पष्ट दिखाई देती है; शरीर के नष्ट होने पर चेतना भी समाप्त हो जाती है–:ऐसा अनुभव हमें दिखाई देता है।
इसलिए चार्वाक शरीर से स्वतंत्र किसी अमर आत्मा को स्वीकार करने के लिए प्रत्यक्ष प्रमाण की माँग करता है।
2.15 चेतना की भौतिक व्याख्या
यहाँ चार्वाक का दर्शन एक महत्वपूर्ण दार्शनिक प्रश्न उठाता है–:
क्या चेतना शरीर से स्वतंत्र सत्ता है, या शरीर की विशिष्ट भौतिक संरचना से उत्पन्न गुण?
चार्वाक दूसरी दिशा में जाता है।
जैसे विभिन्न पदार्थों के संयोजन से ऐसे गुण प्रकट हो सकते हैं जो अलग-अलग घटकों में उसी रूप में दिखाई नहीं देते, वैसे ही शरीर की विशिष्ट संरचना से चेतना उत्पन्न हो सकती है।
इस दृष्टि से चेतना कोई स्वतंत्र आत्मतत्त्व नहीं बल्कि भौतिक संगठन से उत्पन्न घटना है।
यह मत आगे भारतीय दर्शन में आत्मा और चेतना के प्रश्न पर होने वाले व्यापक विवाद की पृष्ठभूमि तैयार करता है।
2.16 आत्मा, पुनर्जन्म और परलोक
यदि शरीर से स्वतंत्र आत्मा को स्वीकार करने के लिए प्रत्यक्ष प्रमाण उपलब्ध नहीं है, तो चार्वाक के लिए निम्न अवधारणाएँ भी समस्या बन जाती हैं–:
- अमर आत्मा
- पुनर्जन्म
- स्वर्ग
- नरक
- परलोक
- अदृश्य कर्मफल
चार्वाक इनका प्रत्यक्ष प्रमाण पूछता है।
इसलिए चार्वाक की आलोचना का मूल आधार धार्मिक विश्वासों का केवल विरोध नहीं है बल्कि उसका ज्ञानमीमांसात्मक प्रश्न है–:
जिस सत्ता का प्रत्यक्ष प्रमाण उपलब्ध नहीं है, उसे निश्चित सत्य के रूप में क्यों स्वीकार किया जाए?
2.17 सुख और नैतिकता
चार्वाक का जीवन-दर्शन सामान्यतः सुखवाद (Hedonism) से जोड़ा जाता है।
यदि यही जीवन प्रत्यक्ष रूप से उपलब्ध है और परलोक का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है, तो मनुष्य को उपलब्ध जीवन के सुख और हित को महत्त्व देना चाहिए।
लेकिन यहाँ चार्वाक को केवल “भोगवादी” कह देना दार्शनिक रूप से पर्याप्त नहीं होगा।
महत्वपूर्ण प्रश्न है–:
क्या सुख का अर्थ तत्काल और असीमित भोग है, या जीवन की वास्तविक परिस्थितियों को देखते हुए उपलब्ध सुख का विवेकपूर्ण उपभोग?
चार्वाक की आलोचना करते समय यह भेद आवश्यक है। प्रसिद्ध लोकप्रचलित उक्ति–:
“ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्”
चार्वाक के साथ जोड़ी जाती है, लेकिन इसे चार्वाक दर्शन का निर्विवाद मूल सूत्र मानकर प्रस्तुत करना उचित नहीं है। चार्वाक साहित्य का अधिकांश भाग प्रत्यक्ष रूप में उपलब्ध नहीं है और उसके मतों का पुनर्निर्माण प्रायः विरोधी दार्शनिक स्रोतों से किया जाता है।
इसलिए पाठ्यपुस्तक में चार्वाक को केवल एक हास्यात्मक “खाओ-पियो” दर्शन के रूप में प्रस्तुत करना उसके दार्शनिक महत्त्व को कम कर देगा।
2.18 चार्वाक की दार्शनिक प्रासंगिकता
चार्वाक का सबसे बड़ा योगदान केवल यह नहीं है कि उसने प्रत्यक्ष को प्रमाण माना।
उसकी वास्तविक दार्शनिक शक्ति उस प्रश्न में है जो वह प्रत्येक ज्ञान-दावे के सामने रखता है–:
“तुम यह कैसे जानते हो?”
यदि कोई आत्मा का दावा करता है–:
प्रमाण क्या है?
यदि कोई ईश्वर का दावा करता है–:
प्रमाण क्या है?
यदि कोई पुनर्जन्म का दावा करता है–:
प्रमाण क्या है?
यदि कोई अनुमान को निश्चित ज्ञान मानता है–:
व्याप्ति कैसे सिद्ध हुई?
इस प्रकार चार्वाक भारतीय दर्शन में आलोचनात्मक ज्ञानमीमांसा (Critical Epistemology) की एक महत्त्वपूर्ण चुनौती प्रस्तुत करता है।
2.19 चार्वाक से न्याय की ओर: दार्शनिक संक्रमण
अब भारतीय दर्शन की यात्रा अगले चरण में प्रवेश करती है।
चार्वाक कहता है–:
प्रत्यक्ष के अतिरिक्त अनुमान को निश्चित प्रमाण क्यों माना जाए?
न्याय दर्शन इसी चुनौती को स्वीकार करता है और पूछता है–:
क्या मनुष्य केवल प्रत्यक्ष से ही यथार्थ ज्ञान प्राप्त कर सकता है?
यदि धुआँ देखकर आग का ज्ञान होता है, तो उस ज्ञान की प्रमाणता का आधार क्या है?
यहीं से न्याय दर्शन–:
प्रमा → प्रमाण → प्रत्यक्ष → अनुमान → व्याप्ति → परामर्श → अनुमिति
की व्यवस्थित ज्ञानमीमांसा विकसित करता है।
इस प्रकार चार्वाक और न्याय के बीच संबंध विरोध का होते हुए भी दार्शनिक विकास की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।
चार्वाक प्रश्न उठाता है–:
“प्रत्यक्ष से आगे जाने का अधिकार कहाँ से मिला?”
न्याय उत्तर खोजता है–:
“व्याप्ति, तर्क और प्रमाण-व्यवस्था के आधार पर अप्रत्यक्ष का यथार्थ ज्ञान कैसे सम्भव है?”
यहीं से भारतीय दर्शन में ज्ञान की समस्या एक नए स्तर पर प्रवेश करती है।
2.20 दार्शनिक सार
चार्वाक दर्शन की पूरी यात्रा को इस क्रम में समझा जा सकता है–:
प्रत्यक्ष को प्रमाण मानना
↓
अनुमान की प्रमाणता पर प्रश्न
↓
व्याप्ति की सार्वभौमिकता पर प्रश्न
↓
अन्वय–व्यतिरेक की सीमाओं पर प्रश्न
↓
अप्रत्यक्ष आत्मा और परलोक का निषेध
↓
भौतिक जगत की स्वीकृति
↓
देहात्मवाद
↓
चेतना की भौतिक व्याख्या
↓
इहलौकिक सुख पर बल
↓
जीवन की प्रत्यक्ष और यथार्थवादी दृष्टि
स्मरण-सूत्र
प्रत्यक्ष → अनुमान पर प्रश्न → व्याप्ति पर प्रश्न → भौतिक जगत → देहात्मवाद → इहलौकिक जीवन
अतः चार्वाक दर्शन का मूल दार्शनिक आग्रह इस प्रकार कहा जा सकता है–
“जिसे सत्य मानो, उसके लिए प्रमाण दो; और जहाँ प्रत्यक्ष आधार उपलब्ध न हो, वहाँ विश्वास को ज्ञान का स्थान मत दो।”
यही चार्वाक को भारतीय दर्शन की परंपरा में एक महत्वपूर्ण आलोचनात्मक और भौतिकवादी स्वर बनाता है।
मानस जिले सिंह
【यथार्थवादी विचारक 】
अनुयायी – मानस पंथ, शिष्य – प्रोफेसर औतार लाल मीणा
उद्देश्य – मानवीय मूल्यों की स्थापना हेतु प्रकृति के नियमों का यथार्थ प्रस्तुतीकरण में संकल्पबद्ध योगदान देना।

