B.A. 1st Indian Philosophy | बी. ए. प्रथम वर्ष भारतीय दर्शन

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JNVU B.A. 1st Year Indian Philosophy – Chapter 2

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अध्याय 2 – भारतीय दर्शन

चार्वाक दर्शन: प्रत्यक्षवाद, भौतिकवाद और जीवन की यथार्थवादी दृष्टि

अध्याय की दार्शनिक यात्रा:
ज्ञान की समस्या → प्रमाण → प्रत्यक्ष → अनुमान की सीमा/निषेध → भौतिक जगत् → देहात्मवाद → आत्मा की समस्या → चेतना की भौतिक व्याख्या → सुख और नैतिकता → चार्वाक की दार्शनिक प्रासंगिकता

अध्याय-क्रम में चार्वाक दर्शन को इसी क्रम में रखा गया है। इसमें प्रत्यक्ष को प्रमाण मानना, अन्य प्रमाणों का निषेध, भौतिक जगत् की वास्तविकता, देहात्मवाद, आत्मा और चेतना की समस्या, सुख-नैतिकता तथा चार्वाक की दार्शनिक प्रासंगिकता शामिल हैं।

2.1 भूमिका: दर्शन की शुरुआत ज्ञान के प्रश्न से

पिछले अध्याय में हमने देखा कि भारतीय दर्शन का मूल प्रयत्न केवल धार्मिक विश्वासों को स्वीकार करना नहीं बल्कि वास्तविकता को जानने का प्रयास है। मनुष्य के सामने सबसे पहला प्रश्न उठता है–

हम जिसे सत्य मानते हैं, उसे सत्य मानने का आधार क्या है?

हम अपने चारों ओर अनेक वस्तुएँ देखते हैं–पेड़, पर्वत, नदी, घर, मनुष्य, पशु, शरीर आदि। इनमें से कुछ का हमें प्रत्यक्ष अनुभव होता है, जबकि कुछ ऐसी बातें हैं जिन्हें हम सीधे नहीं देखते बल्कि उनके बारे में किसी दूसरे आधार से निष्कर्ष निकालते हैं।

उदाहरण के लिए–

दूर पहाड़ पर धुआँ दिखाई देता है। हम कहते हैं–

“वहाँ आग होगी।”

लेकिन हमने आग को सीधे नहीं देखा। हमने धुएँ के आधार पर आग का अनुमान लगाया।

अब चार्वाक दर्शन यहीं एक मूल प्रश्न उठाता है–

क्या अनुमान से प्राप्त ज्ञान को उसी प्रकार निश्चित माना जा सकता है, जिस प्रकार प्रत्यक्ष अनुभव से प्राप्त ज्ञान को माना जाता है?

यहीं से चार्वाक की ज्ञानमीमांसा का प्रवेश होता है।

2.2 चार्वाक दर्शन का मूल प्रश्न

चार्वाक दर्शन को समझने के लिए पहले उसके मूल प्रश्न को समझना आवश्यक है।

यह प्रश्न है–

“वास्तव में वही स्वीकार क्यों न किया जाए जिसका प्रत्यक्ष अनुभव किया जा सकता है?”

चार्वाक का दार्शनिक आग्रह यह है कि ज्ञान का आधार ऐसा होना चाहिए जिसकी विश्वसनीयता स्पष्ट हो। इन्द्रियों द्वारा प्राप्त प्रत्यक्ष अनुभव हमारे लिए सबसे निकट और तत्काल प्रमाण है।

यदि कोई वस्तु हमारे सामने है और हम उसे देख, सुन, स्पर्श, स्वाद या गंध के माध्यम से अनुभव करते हैं, तो उसके अस्तित्व का आधार हमारे पास प्रत्यक्ष रूप में है।

इसलिए चार्वाक की ज्ञानमीमांसा का केंद्रीय सूत्र बनता है–

प्रत्यक्ष ही प्रमाण है।

यहीं से उसकी पूरी दार्शनिक संरचना विकसित होती है।

2.3 प्रमाण क्या है?

प्रमाण का सामान्य अर्थ

प्रमाण वह साधन है जिसके द्वारा हमें यथार्थ ज्ञान प्राप्त होता है।

और उस प्रमाण से प्राप्त यथार्थ ज्ञान को प्रमा कहा जाता है।

सरल रूप में–

प्रमाण → यथार्थ ज्ञान → प्रमा

उदाहरण:

आपके सामने मेज पर एक पुस्तक रखी है।

आप उसे आँखों से देखते हैं।

  • पुस्तक – ज्ञेय वस्तु
  • आँख – ज्ञान का साधन
  • देखने की प्रक्रिया – ज्ञान की प्राप्ति
  • “यह पुस्तक है” – प्राप्त ज्ञान

चार्वाक के लिए इस प्रकार का प्रत्यक्ष अनुभव ज्ञान का सबसे विश्वसनीय आधार है।

2.4 चार्वाक के अनुसार प्रत्यक्ष ही प्रमाण क्यों?

चार्वाक का तर्क समझने के लिए एक सामान्य उदाहरण लें।

मान लीजिए किसी व्यक्ति ने आपके सामने एक आम रखा। आप उसे देखते हैं, छूते हैं और उसका स्वाद लेते हैं।

आप कह सकते हैं–

“यह आम है।”

यह ज्ञान सीधे इन्द्रिय-संपर्क से उत्पन्न हुआ है।

इसीलिए प्रत्यक्ष ज्ञान में–

वस्तु → इन्द्रिय-संपर्क → अनुभव

का सीधा संबंध दिखाई देता है।

इसके विपरीत, जब हम किसी ऐसी वस्तु के बारे में कहते हैं जिसे हमने देखा नहीं है, तब बीच में कोई दूसरा आधार आ जाता है।

यहीं चार्वाक सावधान हो जाता है।

2.5 प्रत्यक्ष ज्ञान क्या है?

प्रत्यक्ष वह ज्ञान है जो इन्द्रियों और वस्तु के प्रत्यक्ष संपर्क से उत्पन्न होता है।

मुख्य पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं–

  1. आँख – रूप
  2. कान – शब्द
  3. नाक – गंध
  4. जीभ – रस
  5. त्वचा – स्पर्श

उदाहरण:

  • आँख से फूल देखना
  • कान से घंटी सुनना
  • नाक से सुगंध अनुभव करना
  • जीभ से मिठास अनुभव करना
  • त्वचा से गर्मी अनुभव करना

इनमें ज्ञान किसी दूसरे व्यक्ति के कथन या किसी अनुमान के माध्यम से नहीं बल्कि प्रत्यक्ष अनुभव से उत्पन्न होता है।

सरल सूत्र

इन्द्रिय + विषय का संपर्क = प्रत्यक्ष ज्ञान

यही चार्वाक की ज्ञानमीमांसा का प्रथम आधार है।

2.6 क्या प्रत्यक्ष हमेशा सही होता है?

यहाँ एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है।

यदि प्रत्यक्ष ही प्रमाण है, तो क्या हमारी प्रत्येक इन्द्रियानुभूति हमेशा सत्य होती है?

उदाहरण के लिए–

गर्म सड़क पर दूर से पानी दिखाई देता है, लेकिन पास जाने पर वहाँ पानी नहीं मिलता। यह मृगतृष्णा है।

इसी प्रकार अंधेरे में रस्सी को साँप समझ लिया जा सकता है।

इससे स्पष्ट होता है कि हर अनुभव को बिना जाँच के यथार्थ नहीं मान लेना चाहिए।

इसलिए चार्वाक की प्रत्यक्षवादिता को समझते समय यह अंतर रखना उपयोगी है–

प्रत्यक्ष अनुभव ज्ञान का आधार है, लेकिन प्रत्यक्ष अनुभव की यथार्थता की जाँच भी आवश्यक हो सकती है।

चार्वाक के लिए निर्णायक बात यह है कि ज्ञान की विश्वसनीयता को ऐसे आधार पर रखा जाए जो अनुभव के निकट हो, न कि केवल अदृश्य सत्ता या परंपरागत विश्वास पर।

2.7 अन्य प्रमाणों का निषेध

भारतीय दर्शन में विभिन्न दर्शन अलग-अलग प्रमाण स्वीकार करते हैं। जैसे–

  • प्रत्यक्ष
  • अनुमान
  • उपमान
  • शब्द
  • अर्थापत्ति
  • अनुपलब्धि आदि।

चार्वाक इन सभी को समान रूप से स्वतंत्र और निश्चित प्रमाण स्वीकार नहीं करता।

विशेष रूप से वह अनुमान और शब्द-प्रमाण के प्रति अत्यंत आलोचनात्मक है।

यहाँ से चार्वाक दर्शन की सबसे महत्वपूर्ण दार्शनिक बहस प्रारंभ होती है।

2.8 अनुमान क्या है?

जब हम किसी ज्ञात तथ्य के आधार पर किसी अज्ञात तथ्य का ज्ञान प्राप्त करते हैं, तो उसे अनुमान कहते हैं।

उदाहरण

आप पहाड़ पर धुआँ देखते हैं।

आप कहते हैं–

“पहाड़ पर आग है।”

यहाँ आपने आग को प्रत्यक्ष नहीं देखा।

आपने–

धुआँ → आग

के संबंध के आधार पर आग का ज्ञान प्राप्त किया।

इसे अनुमान कहते हैं।

2.9 चार्वाक अनुमान को क्यों स्वीकार नहीं करता?

चार्वाक की आपत्ति का मूल प्रश्न है–

क्या धुएँ और आग का संबंध हर परिस्थिति में निश्चित है?

हम सामान्य अनुभव से जानते हैं कि जहाँ धुआँ होता है, वहाँ प्रायः आग होती है। लेकिन चार्वाक पूछ सकता है–

क्या हमने संसार के प्रत्येक स्थान और प्रत्येक समय में धुएँ और आग का संबंध प्रत्यक्ष रूप से देखा है?

नहीं।

हमने सीमित अनुभवों से एक व्यापक नियम बनाया।

यहीं चार्वाक अनुमान की निश्चितता पर प्रश्न उठाता है।

उदाहरण

जहाँ धुआँ दिखाई देता है, वहाँ आग होने की संभावना हो सकती है, लेकिन यदि केवल धुएँ के आधार पर अदृश्य वस्तु के अस्तित्व को निश्चित मान लिया जाए, तो ज्ञान की सीमा पार हो सकती है।

इसलिए चार्वाक के लिए अनुमान–

व्यावहारिक जीवन में उपयोगी हो सकता है, लेकिन उसे अदृश्य या पारलौकिक वस्तुओं के निश्चित ज्ञान का स्वतंत्र प्रमाण नहीं माना जा सकता।

यह सूक्ष्म अंतर बहुत महत्वपूर्ण है।

2.10 व्याप्ति की समस्या

अनुमान की शक्ति व्याप्ति पर निर्भर करती है।

व्याप्ति का अर्थ है–

दो वस्तुओं या घटनाओं के बीच ऐसा सार्वत्रिक संबंध जिसमें एक के होने पर दूसरे की उपस्थिति निश्चित मानी जाए।

जैसे–

“जहाँ धुआँ है, वहाँ आग है।”

लेकिन प्रश्न है–

हमें इस सार्वत्रिक संबंध का पूर्ण ज्ञान कैसे हुआ?

हमने संसार की प्रत्येक परिस्थिति नहीं देखी है।

इसलिए चार्वाक की आपत्ति यह है कि सीमित प्रत्यक्ष अनुभव से सार्वभौमिक और अनिवार्य संबंध स्थापित करना कठिन है।

यहीं चार्वाक अनुमान की प्रमाणिकता पर प्रश्न उठाता है।

2.11 शब्द-प्रमाण के प्रति चार्वाक की दृष्टि

किसी विश्वसनीय व्यक्ति या ग्रंथ के कथन से प्राप्त ज्ञान को भारतीय दर्शन में शब्द-प्रमाण कहा जाता है।

उदाहरण–

एक विद्यार्थी ने किसी स्थान को स्वयं नहीं देखा। शिक्षक कहता है–

“जयपुर राजस्थान में है।”

विद्यार्थी शिक्षक के कथन से उस तथ्य को जानता है।

चार्वाक यहाँ भी प्रश्न करता है–

बोलने वाला व्यक्ति स्वयं सही जानता है, यह कैसे निश्चित होगा?

यदि वक्ता गलत हो सकता है, भ्रमित हो सकता है या जानबूझकर गलत कह सकता है, तो केवल कथन के आधार पर ज्ञान को निश्चित कैसे माना जाए?

इसलिए चार्वाक शब्द को स्वतंत्र और अंतिम प्रमाण के रूप में स्वीकार नहीं करता।

2.12 अनुमान और शब्द के निषेध का व्यापक परिणाम

यहाँ चार्वाक दर्शन की पूरी ज्ञानमीमांसा का एक महत्वपूर्ण परिणाम सामने आता है।

यदि–

  • अनुमान निश्चित प्रमाण नहीं,
  • शब्द स्वतंत्र प्रमाण नहीं,

तो ज्ञान का आधार मुख्यतः–

प्रत्यक्ष अनुभव

पर आ जाता है।

और जब ज्ञान का आधार प्रत्यक्ष अनुभव है, तब दर्शन की दृष्टि भी धीरे-धीरे दृश्य और भौतिक जगत् की ओर मुड़ती है।

यहीं से चार्वाक की ज्ञानमीमांसा उसकी तत्वमीमांसा में प्रवेश करती है।

2.13 भौतिक जगत् की वास्तविकता

चार्वाक के अनुसार यह दृश्य जगत् वास्तविक है।

मनुष्य जिस संसार में रहता है–

  • पृथ्वी
  • जल
  • अग्नि
  • वायु
  • शरीर
  • पेड़-पौधे
  • पशु
  • अन्य भौतिक वस्तुएँ

इनका अस्तित्व प्रत्यक्ष अनुभव में आता है।

इसलिए चार्वाक किसी अदृश्य और अप्रत्यक्ष आध्यात्मिक सत्ता को जगत् की व्याख्या का आवश्यक आधार नहीं मानता।

सरल उदाहरण

हम भोजन को देखते हैं, खाते हैं और उससे शरीर की ऊर्जा प्राप्त करते हैं।

इसके लिए चार्वाक को किसी अदृश्य लोक की आवश्यकता नहीं पड़ती।

उसके लिए पहले से उपलब्ध वास्तविकता है–

यह भौतिक जगत् और उसमें स्थित शरीर।

2.14 चार्वाक का भौतिकवाद

चार्वाक को सामान्यतः भौतिकवादी दर्शन (Materialism) कहा जाता है।

भौतिकवाद का मूल आग्रह है–

वास्तविकता की व्याख्या भौतिक तत्त्वों के आधार पर की जानी चाहिए।

चार्वाक के संदर्भ में परंपरागत रूप से पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु जैसे भौतिक तत्त्वों को मूल माना जाता है।

आकाश को सामान्यतः इन्द्रियगोचर न होने के कारण चार्वाक की भौतिकवादी व्याख्या में विशेष समस्या के रूप में देखा जाता है।

यहाँ मुख्य बात यह है कि चार्वाक जगत् को किसी अदृश्य आध्यात्मिक सत्ता के आधार पर समझने के बजाय भौतिक तत्त्वों और उनके संयोजन से समझना चाहता है।

2.15 चेतना की समस्या

अब चार्वाक दर्शन के सामने एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न आता है–

यदि वास्तविकता मूलतः भौतिक है, तो चेतना कहाँ से आती है?

हम केवल शरीर नहीं हैं; हम सोचते हैं, अनुभव करते हैं, सुख-दुःख महसूस करते हैं, स्मरण करते हैं और निर्णय लेते हैं।

तो प्रश्न उठता है–

क्या चेतना शरीर से अलग कोई स्वतंत्र सत्ता है?

चार्वाक इसका उत्तर अलग ढंग से देता है।

यहीं से देहात्मवाद की अवधारणा सामने आती है।

2.16 देहात्मवाद: शरीर ही आत्मा है?

देहात्मवाद का सामान्य अर्थ है–

देह अर्थात् शरीर को ही आत्मा मानना।

चार्वाक स्वतंत्र, शरीर से अलग किसी अमूर्त आत्मा को स्वीकार नहीं करता।

उसके लिए व्यक्ति का अस्तित्व उसके जीवित शरीर से संबंधित है।

उदाहरण:

जब व्यक्ति जीवित है–

  • वह देखता है,
  • सुनता है,
  • सोचता है,
  • सुख-दुःख अनुभव करता है।

लेकिन मृत्यु के बाद वही शरीर पड़ा रहता है, फिर भी उसमें चेतन अनुभव नहीं रहता।

चार्वाक इस तथ्य को शरीर और चेतना के संबंध को समझने के लिए महत्वपूर्ण मानता है।

2.17 चेतना की भौतिक व्याख्या

चार्वाक के संबंध में परंपरागत रूप से यह उदाहरण दिया जाता है कि जैसे कुछ भौतिक पदार्थों के विशेष संयोजन से एक नया गुण उत्पन्न होता है, वैसे ही भौतिक तत्त्वों के विशिष्ट संगठन से चेतना उत्पन्न होती है।

इसे सरल उदाहरण से समझें।

उदाहरण: पान

पान में अलग-अलग पदार्थ होते हैं–

  • पत्ता
  • कत्था
  • चूना
  • सुपारी आदि।

इनके अलग-अलग रूप और स्वाद होते हैं। लेकिन जब वे एक विशेष संयोजन में आते हैं, तो एक विशिष्ट नया अनुभव उत्पन्न होता है।

इसी प्रकार चार्वाक की भौतिकवादी व्याख्या में शरीर के भौतिक संगठन से चेतना की उत्पत्ति समझी जाती है।

दूसरा सरल उदाहरण

एक-एक करके अलग-अलग वाद्ययंत्रों से संगीत की पूर्ण अनुभूति नहीं होती, लेकिन उनका विशिष्ट संयोजन एक सामंजस्यपूर्ण संगीत उत्पन्न कर सकता है।

चार्वाक का आशय यह है कि–

चेतना को शरीर से अलग स्वतंत्र सत्ता मानना आवश्यक नहीं है; वह शरीर के विशिष्ट भौतिक संगठन से उत्पन्न गुण के रूप में समझी जा सकती है।

2.18 यहाँ एक दार्शनिक सावधानी

यहाँ विद्यार्थियों को एक महत्वपूर्ण बात समझनी चाहिए।

चार्वाक का मत आधुनिक न्यूरोसाइंस का वैज्ञानिक सिद्धांत नहीं है। यह प्राचीन भारतीय भौतिकवादी दार्शनिक व्याख्या है।

इसका दार्शनिक महत्व इस बात में है कि चार्वाक ने चेतना की व्याख्या के लिए–

अदृश्य आत्मा को आवश्यक मानने के बजाय शरीर और भौतिक जगत् से प्रारंभ करने का प्रयास किया।

इसलिए चार्वाक भारतीय दर्शन में चेतना की समस्या पर एक महत्वपूर्ण भौतिकवादी विकल्प प्रस्तुत करता है।

2.19 आत्मा की समस्या

अब प्रश्न है–

क्या शरीर के अतिरिक्त कोई स्वतंत्र आत्मा है?

अनेक भारतीय दर्शन आत्मा को शरीर से भिन्न मानते हैं।

लेकिन चार्वाक इस भिन्न आत्मा को स्वीकार नहीं करता।

यदि आत्मा को–

  • देखा नहीं जा सकता,
  • छुआ नहीं जा सकता,
  • सुना नहीं जा सकता,
  • प्रत्यक्ष अनुभव नहीं किया जा सकता,

तो चार्वाक पूछता है–

उसके अस्तित्व को स्वीकार करने का प्रमाण क्या है?

यहीं उसकी ज्ञानमीमांसा और आत्मा संबंधी दृष्टि एक-दूसरे से जुड़ती है।

तर्क की श्रृंखला

प्रत्यक्ष ही प्रमाण
↓
अप्रत्यक्ष आत्मा का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं
↓
शरीर से अलग आत्मा की आवश्यकता पर प्रश्न
↓
देहात्मवाद

इस प्रकार देहात्मवाद चार्वाक की ज्ञानमीमांसा से अलग कोई अचानक उत्पन्न सिद्धांत नहीं है; वह उसकी व्यापक भौतिकवादी दृष्टि का परिणाम है।

2.20 मृत्यु और आत्मा

यदि आत्मा शरीर से अलग स्वतंत्र सत्ता नहीं है, तो मृत्यु के बाद आत्मा के अस्तित्व का प्रश्न भी बदल जाता है।

चार्वाक के दृष्टिकोण से शरीर के समाप्त होने के साथ व्यक्ति के चेतन अनुभव का भी अंत माना जाता है।

इसलिए–

  • पुनर्जन्म
  • स्वर्ग
  • नरक
  • परलोक

जैसी अवधारणाओं को स्वीकार करने के लिए यदि प्रत्यक्ष आधार नहीं है, तो चार्वाक उन्हें दार्शनिक रूप से स्वीकार करने में सावधानी बरतता है।

यहाँ फिर वही मूल सिद्धांत काम करता है–

जिसके अस्तित्व का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है, उसे यथार्थ मानने से पहले प्रमाण की आवश्यकता है।

2.21 सुख और नैतिकता

अब चार्वाक दर्शन के सामने एक नया प्रश्न आता है।

यदि कोई परलोक नहीं है और जीवन का आधार यही भौतिक जीवन है, तो–

मनुष्य को कैसे जीना चाहिए?

चार्वाक की नैतिक दृष्टि को अक्सर सुखवादी (Hedonistic) कहा जाता है।

इसका अर्थ यह नहीं समझना चाहिए कि चार्वाक का पूरा दर्शन केवल “मनमाना भोग करो” कहता है। चार्वाक के नैतिक चिंतन को समझते समय यह देखना आवश्यक है कि वह इहलौकिक जीवन को महत्व देता है।

मनुष्य का अनुभव होने वाला जीवन यही है।

इसलिए जीवन में–

  • सुख
  • स्वास्थ्य
  • भौतिक समृद्धि
  • वर्तमान जीवन की उपयोगिता

को महत्व प्राप्त होता है।

2.22 “सुख” का प्रश्न

मानव जीवन में सुख स्वाभाविक आकांक्षा है।

कोई व्यक्ति भोजन करता है क्योंकि भूख मिटाना चाहता है।

कोई घर बनाता है क्योंकि सुरक्षा और सुविधा चाहता है।

कोई शिक्षा प्राप्त करता है क्योंकि ज्ञान और जीवन-संभावनाएँ बढ़ाना चाहता है।

इस प्रकार सुख केवल विलासिता नहीं; व्यापक अर्थ में जीवन की संतुष्टि और सुविधा भी सुख से जुड़ सकती है।

चार्वाक का दार्शनिक आग्रह है कि वास्तविक जीवन की आवश्यकताओं और सुखों को किसी काल्पनिक परलोक के नाम पर निरर्थक न माना जाए।

2.23 क्या चार्वाक केवल भोगवाद है?

यहाँ विद्यार्थियों को परीक्षा में विशेष सावधानी रखनी चाहिए।

चार्वाक को केवल इस एक वाक्य में सीमित कर देना–

“चार्वाक का दर्शन खाओ, पियो और मौज करो।”

दार्शनिक दृष्टि से अत्यधिक सरलीकरण होगा।

चार्वाक का व्यापक महत्व इससे कहीं अधिक है।

उसकी मूल चुनौती है–

मनुष्य को अदृश्य सत्ता, अप्रमाणित परलोक और अनपेक्षित आध्यात्मिक दावों को स्वीकार करने से पहले प्रमाण माँगना चाहिए।

इस दृष्टि से चार्वाक–

ज्ञान की प्रमाणिकता, भौतिक जगत् की वास्तविकता और इहलौकिक जीवन के मूल्य को सामने रखता है।

2.24 प्रसिद्ध चार्वाक सूत्र की समझ

चार्वाक के संदर्भ में प्रसिद्ध उक्ति–

“यावत् जीवेत् सुखं जीवेत् ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्।”

अर्थात्–जब तक जीवित रहो, सुखपूर्वक जीवन बिताओ; आवश्यकता हो तो ऋण लेकर भी घी पियो।

लेकिन इसे सीधे चार्वाक दर्शन का प्रमाण मानते समय सावधानी आवश्यक है। चार्वाक के मूल ग्रंथ लगभग उपलब्ध नहीं हैं और उसके विचारों का बहुत-सा विवरण बाद के विरोधी दार्शनिक स्रोतों से मिलता है।

इसलिए शैक्षणिक रूप से उचित होगा कि हम कहें–

यह उक्ति चार्वाक की लोकप्रिय भोगवादी छवि को व्यक्त करती है; परंतु चार्वाक दर्शन को केवल इस उक्ति तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए।

2.25 चार्वाक दर्शन: एक संपूर्ण दार्शनिक संरचना

अब तक की चर्चा को जोड़ें तो चार्वाक दर्शन का विकास इस प्रकार दिखाई देता है–

पहला प्रश्न – ज्ञान क्या है?

↓

उत्तर – प्रत्यक्ष ज्ञान सबसे विश्वसनीय आधार है।

↓

दूसरा प्रश्न – अनुमान को क्यों स्वीकार करें?

↓

उत्तर – सार्वभौमिक व्याप्ति की निश्चितता पर प्रश्न उठाया जा सकता है।

↓

तीसरा प्रश्न – अदृश्य आत्मा का प्रमाण क्या है?

↓

उत्तर – प्रत्यक्ष प्रमाण के अभाव में शरीर से अलग आत्मा स्वीकार नहीं।

↓

चौथा प्रश्न – फिर चेतना क्या है?

↓

उत्तर – चेतना को शरीर के भौतिक संगठन से संबंधित गुण के रूप में समझा जा सकता है।

↓

पाँचवाँ प्रश्न – वास्तविक जगत् कौन-सा है?

↓

उत्तर – प्रत्यक्ष अनुभव में आने वाला भौतिक जगत्।

↓

छठा प्रश्न – मनुष्य को कैसे जीना चाहिए?

↓

उत्तर – वर्तमान, प्रत्यक्ष और इहलौकिक जीवन के सुख और हित को महत्व देते हुए।

यही चार्वाक दर्शन की क्रमिक दार्शनिक संरचना है।

2.26 एक समग्र उदाहरण से चार्वाक को समझें

मान लीजिए एक व्यक्ति बीमार है।

प्रश्न 1: बीमारी वास्तविक है या नहीं?

चार्वाक कहेगा–शरीर की अवस्था को प्रत्यक्ष अनुभव और निरीक्षण के आधार पर समझो।

प्रश्न 2: बीमारी क्यों हुई?

यदि कारण प्रत्यक्ष या अनुभव-सिद्ध रूप में जाना जा सकता है, तो उसे स्वीकार किया जा सकता है।

प्रश्न 3: क्या यह किसी पिछले जन्म के कर्म का फल है?

चार्वाक पूछेगा–

इसका प्रत्यक्ष प्रमाण क्या है?

प्रश्न 4: क्या किसी अदृश्य आत्मा को बीमारी हो रही है?

फिर वही प्रश्न–

शरीर से अलग आत्मा के अस्तित्व का प्रमाण क्या है?

प्रश्न 5: क्या उपचार करना चाहिए?

हाँ, क्योंकि वर्तमान शरीर और वर्तमान जीवन प्रत्यक्ष वास्तविकता हैं।

इस छोटे से उदाहरण में चार्वाक की पूरी दृष्टि दिखाई देती है–

प्रत्यक्ष → भौतिक जगत् → शरीर → वर्तमान जीवन → इहलौकिक हित।

2.27 चार्वाक की दार्शनिक प्रासंगिकता

चार्वाक दर्शन का महत्व केवल इसलिए नहीं है कि वह अन्य भारतीय दर्शनों से अलग मत रखता है। उसका महत्व इस बात में भी है कि वह भारतीय दर्शन के भीतर प्रश्न करने और प्रमाण माँगने की परंपरा को तीखा बनाता है।

उसकी प्रासंगिकता को निम्न बिंदुओं में समझा जा सकता है–

1. प्रमाण की माँग

चार्वाक पूछता है–

किसी बात को सत्य मानने का प्रमाण क्या है?

2. प्रत्यक्ष अनुभव का महत्व

वह मनुष्य के प्रत्यक्ष अनुभव को दार्शनिक विचार का आधार बनाता है।

3. भौतिक जगत् की स्वीकृति

वह इस दृश्य संसार को केवल भ्रम या गौण वास्तविकता मानकर समाप्त नहीं करता।

4. आत्मा की समस्या पर प्रश्न

वह शरीर से अलग आत्मा की आवश्यकता को चुनौती देता है।

5. चेतना की वैकल्पिक व्याख्या

वह चेतना को भौतिक शरीर से संबंधित मानने का प्रयास करता है।

6. परलोक के प्रति आलोचनात्मक दृष्टि

वह स्वर्ग, नरक और पुनर्जन्म जैसी अवधारणाओं के लिए प्रमाण की माँग करता है।

7. इहलौकिक जीवन का महत्व

वह वर्तमान जीवन और उसके सुख को दार्शनिक चर्चा के केंद्र में लाता है।

2.28 चार्वाक को भारतीय दर्शन में कहाँ रखें?

यहाँ एक महत्वपूर्ण बात याद रखनी चाहिए।

चार्वाक को नास्तिक दर्शन कहा जाता है, लेकिन यहाँ “नास्तिक” का अर्थ केवल “ईश्वर को न मानने वाला” नहीं है। भारतीय दर्शन की पारंपरिक वर्गीकरण-पद्धति में आस्तिक–नास्तिक का प्रश्न मुख्यतः वेद की प्रामाणिकता को स्वीकार करने या न करने से संबंधित है।

इसलिए चार्वाक भारतीय दर्शन की उस परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है जो–

वेद-प्रामाण्य, अदृश्य आत्मा और परलोक जैसी मान्यताओं को प्रमाण के आधार पर चुनौती देती है।

2.29 चार्वाक और अगले अध्याय की ओर संक्रमण

अब यहाँ एक अत्यंत सुंदर दार्शनिक संक्रमण उत्पन्न होता है।

चार्वाक कहता है–

सत्य को प्रत्यक्ष के आधार पर समझो।

लेकिन अब प्रश्न उठता है–

क्या सत्य को केवल एक ही दृष्टि से जाना जा सकता है?

यदि किसी वस्तु के अनेक पक्ष हों तो?

उदाहरण के लिए–

एक व्यक्ति कहता है–

“यह वस्तु भारी है।”

दूसरा कहता है–

“यह वस्तु हल्की है।”

क्या दोनों में से एक ही अनिवार्य रूप से गलत है?

संभव है कि दोनों अलग संदर्भों में सही हों।

यहीं भारतीय दर्शन का अगला महत्वपूर्ण मोड़ आता है–

सत्य एकांगी है या बहुआयामी?

चार्वाक जहाँ प्रत्यक्ष और निश्चित अनुभव पर बल देता है, वहीं जैन दर्शन अनेकान्तवाद के माध्यम से यह प्रश्न उठाता है कि वस्तु को अनेक दृष्टियों से समझना आवश्यक हो सकता है।

इस प्रकार–

चार्वाक → प्रत्यक्ष की प्रधानता

से

जैन → सत्य की बहुआयामीता

की ओर हमारी दार्शनिक यात्रा आगे बढ़ती है।

2.30 अध्याय का दार्शनिक सार

चार्वाक दर्शन को केवल “भौतिकवादी दर्शन” कह देना पर्याप्त नहीं है। इसकी मूल संरचना को समझने के लिए उसके विचारों को एक क्रम में देखना चाहिए–

ज्ञान के आधार की खोज
↓
प्रत्यक्ष को प्रमाण मानना
↓
अनुमान की निश्चितता पर प्रश्न
↓
शब्द और अदृश्य सत्ता के प्रति आलोचनात्मक दृष्टि
↓
भौतिक जगत् की वास्तविकता
↓
शरीर को व्यक्ति की आधारभूत वास्तविकता मानना
↓
स्वतंत्र आत्मा की अस्वीकृति
↓
चेतना की भौतिक व्याख्या
↓
परलोक की अपेक्षा इहलौकिक जीवन पर बल
↓
सुख और जीवन-मूल्य की स्वीकृति

अतः चार्वाक दर्शन का मूल दार्शनिक आग्रह इस प्रकार कहा जा सकता है–

“जिसे सत्य मानो, उसके लिए प्रमाण दो; और जहाँ प्रत्यक्ष आधार उपलब्ध न हो, वहाँ विश्वास को ज्ञान का स्थान मत दो।”

यही चार्वाक को भारतीय दर्शन की परंपरा में एक महत्वपूर्ण आलोचनात्मक और भौतिकवादी स्वर बनाता है।

मानस जिले सिंह
【यथार्थवादी विचारक 】
अनुयायी – मानस पंथ, शिष्य – प्रोफेसर औतार लाल मीणा
उद्देश्य – मानवीय मूल्यों की स्थापना हेतु प्रकृति के नियमों का यथार्थ प्रस्तुतीकरण में संकल्पबद्ध योगदान देना।

www.sakshiyoga.org

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