JNVU B.A. 1st Year Western Philosophy – Chapter 1
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अध्याय–1
पाश्चात्य दर्शन: अर्थ, स्वरूप, प्रश्न और प्रारंभिक यूनानी दार्शनिक परंपरा
1.1 प्रस्तावना
मनुष्य केवल अपने चारों ओर घटित होने वाली घटनाओं को देखता ही नहीं बल्कि उनके कारण, आधार और अर्थ को भी समझना चाहता है। वह पूछता है–
यह संसार क्या है?
इसका मूल क्या है?
जो कुछ दिखाई देता है, क्या वही वास्तविकता है?
परिवर्तन क्यों होता है?
क्या इस परिवर्तन के पीछे कोई स्थायी तत्त्व है?
मनुष्य सत्य को कैसे जान सकता है?
ज्ञान और मत में क्या अंतर है?
मनुष्य को कैसे जीवन जीना चाहिए?
जब ऐसे प्रश्न केवल परंपरा, विश्वास या तत्काल अनुभव के स्तर पर नहीं रुकते बल्कि तर्क, विवेक, निरीक्षण और व्यवस्थित चिंतन के माध्यम से उनके उत्तर खोजे जाते हैं, तब दार्शनिक चिंतन का जन्म होता है।
इसी अर्थ में दर्शन मनुष्य की उस बौद्धिक यात्रा का नाम है जिसमें वह–
अनुभव → प्रश्न → चिंतन → तर्क → अन्वेषण → बोध
की दिशा में आगे बढ़ता है।
पाश्चात्य दर्शन भी इसी मानवीय प्रश्नाकुलता की एक दीर्घ ऐतिहासिक अभिव्यक्ति है। इसकी प्रारंभिक व्यवस्थित दार्शनिक अभिव्यक्ति प्राचीन यूनान में दिखाई देती है, जहाँ प्राकृतिक जगत, पदार्थ, परिवर्तन, अस्तित्व, ज्ञान और मनुष्य के जीवन से संबंधित प्रश्नों को मिथकीय व्याख्याओं से आगे बढ़ाकर तर्कपूर्ण ढंग से समझने का प्रयास किया गया।
इसीलिए पाश्चात्य दर्शन की यात्रा को समझने के लिए उसका आरंभ प्राचीन यूनानी दर्शन से करना आवश्यक है।
1.2 ‘दर्शन’ और Philosophy का अर्थ
भारतीय परंपरा में ‘दर्शन’ शब्द संस्कृत की ‘दृश्’ धातु से बना है, जिसका सामान्य अर्थ है–देखना। दार्शनिक अर्थ में यह केवल आँखों से देखने का नाम नहीं बल्कि यथार्थ को समझने और उसके वास्तविक स्वरूप तक पहुँचने का प्रयास है।
पाश्चात्य परंपरा में दर्शन के लिए प्रयुक्त अंग्रेजी शब्द Philosophy यूनानी मूल के दो शब्दों से संबंधित माना जाता है–
Philo – प्रेम या अनुराग
Sophia – प्रज्ञा या Wisdom
अर्थात् Philosophy का शाब्दिक अर्थ है–
“प्रज्ञा के प्रति प्रेम” अथवा “ज्ञान के प्रति अनुराग।”
लेकिन Philosophy को केवल ज्ञान के प्रति प्रेम मानना पर्याप्त नहीं है। दार्शनिक दृष्टि से Philosophy उन मूलभूत प्रश्नों का तार्किक, आलोचनात्मक और व्यवस्थित अन्वेषण है जो सत्य, ज्ञान, अस्तित्व, जगत, मनुष्य और मूल्य से संबंधित हैं।
इसलिए–
Philosophy = प्रज्ञा की खोज का तर्कपूर्ण एवं आलोचनात्मक अन्वेषण।
यहाँ दर्शन केवल यह नहीं पूछता–
“क्या है?”
बल्कि आगे पूछता है–
“क्यों है?”
“कैसे है?”
“हम इसे कैसे जानते हैं?”
“हमारे ज्ञान की विश्वसनीयता क्या है?”
“जो दिखाई देता है और जो वास्तव में है, क्या दोनों एक ही हैं?”
यहीं से सामान्य जिज्ञासा दार्शनिक प्रश्न में परिवर्तित होती है।
1.3 दर्शन की शुरुआत प्रश्न से
दर्शन किसी निश्चित उत्तर को स्वीकार करने से पहले प्रश्न करना सिखाता है।
उदाहरण के लिए–
“वर्षा हो रही है।”
यह एक अनुभव है।
लेकिन–
वर्षा क्यों होती है?
इसके पीछे कौन-सा प्राकृतिक कारण है?
प्रकृति का मूल क्या है?
क्या प्रत्येक प्राकृतिक घटना के पीछे कोई मूलभूत तत्त्व है?
ये प्रश्न चिंतन को अनुभव से आगे ले जाते हैं।
इसी प्रकार–
“संसार बदलता रहता है।”
यह अनुभव है।
लेकिन–
यदि सब कुछ बदल रहा है तो क्या कोई स्थायी तत्त्व है?
क्या परिवर्तन वास्तविकता का मूल स्वरूप है?
या परिवर्तन के पीछे कोई अपरिवर्तनशील सत्ता है?
ये प्रश्न आगे चलकर यूनानी दर्शन के अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न बने।
इस प्रकार दार्शनिक यात्रा को इस सूत्र में समझा जा सकता है–
अनुभव → जिज्ञासा → प्रश्न → तर्क → अन्वेषण → दार्शनिक निष्कर्ष
1.4 पाश्चात्य दर्शन का स्वरूप
पाश्चात्य दर्शन किसी एक मत, किसी एक दार्शनिक या किसी एक सिद्धांत का नाम नहीं है। यह अनेक शताब्दियों में विकसित हुई विचार-परंपराओं का व्यापक संसार है।
इसमें विभिन्न कालों में अलग-अलग प्रश्न प्रमुख रहे–
- प्रारंभिक यूनानी दर्शन में प्रकृति और जगत के मूल तत्त्व का प्रश्न।
- सुकरात में मनुष्य, ज्ञान और सदाचार का प्रश्न।
- प्लेटो में ज्ञान और Forms/Ideas का प्रश्न।
- अरस्तू में कारण, पदार्थ-रूप और सत्ता की संरचना का प्रश्न।
- मध्यकालीन दर्शन में ईश्वर, सृष्टि, विश्वास और तर्क का प्रश्न।
- आधुनिक दर्शन में ज्ञान, अनुभव, बुद्धि और निश्चितता के प्रश्न।
- आधुनिक और समकालीन दर्शन में भाषा, अस्तित्व, चेतना, स्वतंत्रता और ज्ञान की सीमाओं के प्रश्न।
अर्थात् पाश्चात्य दर्शन की विकास-यात्रा में प्रश्नों का केंद्र बदलता रहा, लेकिन सत्य और यथार्थ की खोज उसकी मूल दार्शनिक प्रेरणा बनी रही।
1.5 पाश्चात्य दर्शन का आरंभ: मिथोस से लोगोस् की ओर
प्राचीन यूनानी समाज में प्रकृति और विश्व की व्याख्या लंबे समय तक मिथकीय एवं धार्मिक कथाओं के माध्यम से की जाती थी।
प्रकृति की घटनाओं को देवताओं, दैवी शक्तियों और पौराणिक कथाओं से समझाया जाता था।
लेकिन धीरे-धीरे कुछ चिंतकों ने यह प्रश्न उठाना शुरू किया–
क्या प्रकृति को प्रकृति के भीतर मौजूद कारणों के आधार पर समझा जा सकता है?
यहीं से एक महत्वपूर्ण बौद्धिक परिवर्तन दिखाई देता है–
Mythos → Logos
अर्थात्–
मिथकीय व्याख्या → तर्कपूर्ण व्याख्या
यह परिवर्तन अचानक और पूर्ण रूप से नहीं हुआ था। मिथकीय और धार्मिक चिंतन समाप्त होकर तुरंत दर्शन में परिवर्तित नहीं हो गया। बल्कि यूनानी चिंतन में धीरे-धीरे तर्क, निरीक्षण, प्राकृतिक कारण और अवधारणात्मक विश्लेषण का महत्व बढ़ा।
यही प्रक्रिया प्रारंभिक यूनानी दर्शन की आधारभूमि बनी।
1.6 यूनानी दर्शन के उद्भव की आधारभूमि
प्रारंभिक यूनानी दर्शन के विकास के पीछे अनेक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परिस्थितियाँ थीं। इनमें प्रमुख रूप से–
1. प्रकृति के प्रति जिज्ञासा
यूनानी चिंतकों ने प्रकृति को केवल दैवी शक्ति के रूप में स्वीकार करने के बजाय उसके भीतर निहित व्यवस्था और कारणों को समझने का प्रयास किया।
2. नगर-राज्यों का विकास
यूनानी नगर-राज्यों में सार्वजनिक जीवन, संवाद और वाद-विवाद की परंपरा विकसित हुई। इससे तर्कपूर्ण विचार-विमर्श को अवसर मिला।
3. व्यापार और सांस्कृतिक संपर्क
यूनानी समाज का अन्य सभ्यताओं से संपर्क बढ़ा। इससे विभिन्न प्रकार के ज्ञान और विचारों का आदान-प्रदान हुआ।
4. गणित और ज्यामिति का विकास
संख्या, अनुपात, आकृति और व्यवस्था के अध्ययन ने विश्व को एक व्यवस्थित संरचना के रूप में देखने की प्रवृत्ति को मजबूत किया।
5. तर्कपूर्ण व्याख्या की आवश्यकता
प्रकृति और जगत की घटनाओं को समझने के लिए केवल कथा या परंपरा पर्याप्त नहीं मानी गई; उनके पीछे कारण खोजने की प्रवृत्ति विकसित हुई।
इस प्रकार यूनानी दर्शन के उद्भव को केवल एक व्यक्ति या एक घटना का परिणाम मानना उचित नहीं होगा। यह एक व्यापक बौद्धिक परिवर्तन की प्रक्रिया थी।
1.7 प्रारंभिक यूनानी दर्शन का मूल प्रश्न
प्रारंभिक यूनानी दार्शनिकों के चिंतन के केंद्र में एक मूल प्रश्न उभरता है–
“इस जगत का मूल तत्त्व क्या है?”
यूनानी दर्शन में इसके लिए Arche (आर्खे) की संकल्पना महत्वपूर्ण है।
Arche का आशय उस मूल आधार, प्रथम तत्त्व या मूल सिद्धांत से है जिससे जगत की व्याख्या की जा सके।
प्रश्न यह था–
अनेक वस्तुओं से बने इस जगत के पीछे क्या कोई एक मूल तत्त्व है?
यदि है, तो वह क्या है?
यहीं से प्रारंभिक यूनानी दर्शन में Cosmology, Substance, Being और Becoming जैसे प्रश्नों का विकास हुआ।
1.8 थेल्स: जल को मूल तत्त्व मानने का प्रश्न
प्रारंभिक यूनानी दार्शनिकों में Thales का नाम विशेष रूप से लिया जाता है।
उसका प्रमुख दार्शनिक प्रश्न था–
संसार की विविध वस्तुओं के पीछे मूल तत्त्व क्या है?
थेल्स ने जल को मूल तत्त्व के रूप में माना।
यहाँ दार्शनिक महत्व केवल इस बात में नहीं है कि उसने जल को मूल माना बल्कि इस बात में है कि उसने विश्व की व्याख्या के लिए किसी प्राकृतिक तत्त्व को आधार बनाने का प्रयास किया।
इससे चिंतन की दिशा–
दैवी कथा से प्राकृतिक कारण की ओर
बढ़ती दिखाई देती है।
1.9 अनैक्सिमेण्डर: Apeiron की अवधारणा
थेल्स के बाद Anaximander ने मूल तत्त्व की समस्या को और अधिक अमूर्त रूप में समझने का प्रयास किया।
उसके अनुसार जगत का मूल किसी विशिष्ट दिखाई देने वाले पदार्थ में सीमित नहीं किया जा सकता। उसने Apeiron की संकल्पना प्रस्तुत की, जिसका सामान्य अर्थ है–
असीम, अनिश्चित अथवा अपरिमित मूल आधार।
यहाँ प्रश्न और अधिक गहरा हो जाता है–
यदि संसार में अनेक सीमित वस्तुएँ हैं, तो उनका मूल स्वयं किसी एक सीमित वस्तु तक कैसे सीमित हो सकता है?
इस प्रकार मूल तत्त्व की खोज प्रत्यक्ष पदार्थ से अधिक अमूर्त दार्शनिक आधार की ओर बढ़ती है।
1.10 अनैक्सिमेनीज़: वायु का सिद्धांत
Anaximenes ने वायु को मूल तत्त्व माना।
उसके चिंतन में यह विचार महत्वपूर्ण है कि विभिन्न वस्तुओं की उत्पत्ति और परिवर्तन को मूल तत्त्व में होने वाले परिवर्तनों के माध्यम से समझा जा सकता है।
इस प्रकार प्रारंभिक यूनानी चिंतन में एक महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आया–
एक मूल तत्त्व से अनेक वस्तुओं की उत्पत्ति कैसे संभव है?
यहीं से परिवर्तन और उत्पत्ति की समस्या अधिक स्पष्ट होती है।
1.11 पाइथागोरस: संख्या और व्यवस्था
Pythagoras और पाइथागोरियन परंपरा ने विश्व की व्याख्या में संख्या, अनुपात और व्यवस्था को विशेष महत्व दिया।
यहाँ जगत को केवल पदार्थों के संग्रह के रूप में नहीं बल्कि एक व्यवस्थित संरचना के रूप में समझने की प्रवृत्ति दिखाई देती है।
इससे दार्शनिक प्रश्न एक नए स्तर पर पहुँचता है–
क्या विश्व की वास्तविक संरचना उसके दिखाई देने वाले पदार्थों में है या उसके पीछे मौजूद गणितीय व्यवस्था में?
पाइथागोरियन चिंतन ने संख्या और व्यवस्था को दार्शनिक विचार का महत्वपूर्ण विषय बनाया।
1.12 प्रारंभिक यूनानी दर्शन में ‘Being’ और ‘Becoming’
यूनानी दर्शन के विकास में आगे दो अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न उभरते हैं–
Being – सत्ता या अस्तित्व
जो वास्तव में है, उसका स्वरूप क्या है?
Becoming – होना, बनना या परिवर्तन
जो कुछ निरंतर बदल रहा है, उसका वास्तविक स्वरूप क्या है?
यहीं से एक गहरी दार्शनिक समस्या उत्पन्न होती है–
यदि सब कुछ बदल रहा है, तो वास्तविकता क्या है?
और दूसरी ओर–
यदि वास्तविकता स्थायी है, तो परिवर्तन को कैसे समझा जाए?
यह प्रश्न आगे Heraclitus और Parmenides जैसे दार्शनिकों के चिंतन में अत्यंत महत्वपूर्ण रूप ग्रहण करता है।
1.13 हेराक्लाइटस: परिवर्तन का प्रश्न
Heraclitus के दर्शन में परिवर्तन और Becoming का प्रश्न केंद्रीय है।
उसके चिंतन में जगत को निरंतर परिवर्तनशील प्रक्रिया के रूप में समझने की प्रवृत्ति दिखाई देती है।
इसलिए उसके संदर्भ में मूल दार्शनिक प्रश्न है–
क्या परिवर्तन स्वयं वास्तविकता का मूल स्वरूप है?
यहाँ दर्शन स्थिर वस्तुओं की सूची बनाने के बजाय परिवर्तन की प्रक्रिया को समझने का प्रयास करता है।
1.14 पार्मेनाइड्स: सत्ता की समस्या
Parmenides ने परिवर्तन और इंद्रिय-अनुभव की विश्वसनीयता के प्रश्न को एक अलग दिशा दी।
उसका चिंतन Being अर्थात् सत्ता की समस्या पर केंद्रित है।
मूल प्रश्न–
जो वास्तव में है, क्या वह उत्पन्न या नष्ट हो सकता है?
यदि कोई वस्तु वास्तव में ‘है’, तो उसके ‘न होने’ में परिवर्तन को कैसे समझाया जाएगा?
इस प्रकार पार्मेनाइड्स का चिंतन हमें यह विचार करने के लिए प्रेरित करता है कि–
इंद्रियों से दिखाई देने वाला परिवर्तन और बुद्धि द्वारा विचारित सत्ता क्या एक ही स्तर की वास्तविकता हैं?
यहीं से इंद्रिय-अनुभव और बुद्धि के संबंध की दार्शनिक समस्या भी उभरती है।
1.15 ज़ेनो: परिवर्तन की समस्या और तर्क
Zeno को पार्मेनाइड्स की परंपरा से जोड़कर देखा जाता है। उसके तर्कों का उद्देश्य परिवर्तन और गति के संबंध में उत्पन्न समस्याओं को उजागर करना था।
उसके प्रसिद्ध तर्कों ने यह प्रश्न उठाया–
यदि वस्तु को एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाना है, तो गति को तार्किक रूप से कैसे समझाया जाए?
इस प्रकार यूनानी दर्शन में केवल प्रकृति का वर्णन नहीं किया जा रहा था बल्कि तर्क की शक्ति से सामान्य अनुभव की दार्शनिक परीक्षा की जा रही थी।
1.16 बहुलता और परिवर्तन की समस्या
प्रारंभिक यूनानी दर्शन में एक ओर ऐसे विचार विकसित हुए जो किसी मूल एकता या स्थायी सत्ता पर बल देते थे, वहीं दूसरी ओर जगत की बहुलता और परिवर्तन को समझाने की आवश्यकता बनी रही।
इसी समस्या के संदर्भ में आगे–
- Empedocles
- Anaxagoras
- Democritus
जैसे चिंतकों ने अपने-अपने सिद्धांत प्रस्तुत किए।
इन चिंतनों में पदार्थ, जगत, परिवर्तन और उसके कारणों को समझने के विभिन्न प्रयास दिखाई देते हैं।
इस प्रकार प्रारंभिक यूनानी दर्शन धीरे-धीरे एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न की ओर बढ़ता है–
एकता और बहुलता का संबंध क्या है?
और–
स्थायित्व और परिवर्तन का संबंध क्या है?
1.17 प्रारंभिक यूनानी दर्शन की विकास-यात्रा
प्रारंभिक यूनानी दर्शन को एक सरल दार्शनिक यात्रा में इस प्रकार देखा जा सकता है–
प्रकृति क्या है?
↓
जगत का मूल तत्त्व क्या है?
↓
वस्तुओं की उत्पत्ति कैसे होती है?
↓
परिवर्तन वास्तविक है या केवल दिखाई देता है?
↓
स्थायी सत्ता क्या है?
↓
एक और अनेक का संबंध क्या है?
↓
ज्ञान का विश्वसनीय आधार क्या है?
यही प्रश्न आगे चलकर सुकरात, प्लेटो और अरस्तू के दर्शन में अधिक विकसित रूप प्राप्त करते हैं।
JNVU के Semester-I syllabus में भी प्रारंभिक यूनानी दर्शन के बाद क्रमशः Socrates → Plato → Aristotle को रखा गया है।
1.18 प्रारंभिक यूनानी दर्शन की दार्शनिक विशेषताएँ
1. मिथकीय व्याख्या से तर्कपूर्ण व्याख्या की ओर
प्राकृतिक घटनाओं को समझाने में तर्क और प्राकृतिक कारणों का महत्व बढ़ा।
2. प्रकृति का दार्शनिक अध्ययन
प्रकृति केवल धार्मिक अनुभव का विषय नहीं रही; वह दार्शनिक अन्वेषण का विषय बनी।
3. मूल तत्त्व की खोज
Arche की खोज ने जगत के आधार की समस्या को जन्म दिया।
4. पदार्थ और जगत की समस्या
प्रश्न उठा कि जगत किन मूल तत्त्वों से बना है।
5. परिवर्तन की समस्या
यदि संसार निरंतर बदल रहा है तो परिवर्तन का दार्शनिक स्वरूप क्या है?
6. सत्ता की समस्या
जो वास्तव में है, उसकी प्रकृति क्या है?
7. एकता और बहुलता
अनेक वस्तुओं से बने संसार के पीछे एक मूल तत्त्व है या अनेक मूल तत्त्व?
8. बुद्धि और इंद्रिय का संबंध
क्या वास्तविकता वही है जो इंद्रियों से दिखाई देती है, या बुद्धि उसके गहरे स्वरूप तक पहुँच सकती है?
9. तर्क का विकास
दार्शनिक मतों की परीक्षा में तर्क का महत्व बढ़ा।
1.19 पाश्चात्य दर्शन की आगे की दिशा
प्रारंभिक यूनानी दार्शनिकों ने मुख्यतः प्रकृति और जगत की समस्या को केंद्र में रखा। लेकिन दर्शन की यात्रा यहीं नहीं रुकती।
आगे प्रश्न बदलता है–
सत्य क्या है? से
मनुष्य सत्य को कैसे जानता है?
और–
जगत क्या है? से
मनुष्य को कैसे जीना चाहिए?
की ओर।
यहीं से Sophists और Socrates के साथ मानव-केंद्रित दार्शनिक प्रश्न अधिक स्पष्ट होते हैं।
फिर प्लेटो में–
ज्ञान, मत, Ideas/Forms, आत्मा और राज्य
जैसे प्रश्न सामने आते हैं।
अरस्तू में–
कारण, पदार्थ, रूप, संभाव्यता, वास्तविकता, आत्मा और ईश्वर
जैसे प्रश्न व्यवस्थित दार्शनिक रूप ग्रहण करते हैं।
इस प्रकार प्रारंभिक यूनानी दर्शन केवल पाश्चात्य दर्शन का पहला अध्याय नहीं है; यह आगे विकसित होने वाले अनेक दार्शनिक प्रश्नों की आधारभूमि है।
1.20 भारतीय और पाश्चात्य दर्शन: एक प्रारंभिक संकेत
भारतीय और पाश्चात्य दर्शन को समझते समय दोनों को एक-दूसरे की प्रतिलिपि मानना उचित नहीं है। दोनों की अपनी ऐतिहासिक परिस्थितियाँ, भाषाएँ, प्रश्न-परंपराएँ और दार्शनिक पद्धतियाँ हैं।
फिर भी एक महत्वपूर्ण समानता दिखाई देती है–
दोनों परंपराओं में मनुष्य ने पूछा–
यथार्थ क्या है?
सत्य क्या है?
ज्ञान क्या है?
मनुष्य कौन है?
जीवन का अर्थ क्या है?
अंतर यह है कि इन प्रश्नों को अलग-अलग ऐतिहासिक और दार्शनिक संदर्भों में विकसित किया गया।
इसलिए भारतीय दर्शन की तरह पाश्चात्य दर्शन को भी केवल दार्शनिकों और सिद्धांतों की सूची के रूप में नहीं पढ़ना चाहिए। प्रत्येक दार्शनिक के पीछे यह देखना आवश्यक है–
उसके सामने कौन-सा प्रश्न था?
उसने प्रश्न को किस रूप में समझा?
उसने कौन-सा प्रमाण या तर्क स्वीकार किया?
उसके निष्कर्ष का दार्शनिक आधार क्या था?
1.21 दर्शन: मतों का संग्रह नहीं, संवाद की परंपरा
पाश्चात्य दर्शन का अध्ययन यदि केवल इस रूप में किया जाए कि–
थेल्स ने क्या कहा?
अनैक्सिमेण्डर ने क्या कहा?
हेराक्लाइटस ने क्या कहा?
पार्मेनाइड्स ने क्या कहा?
तो दर्शन केवल सूचनाओं का संग्रह बन जाएगा।
दार्शनिक अध्ययन का वास्तविक उद्देश्य इससे आगे है।
हमें पूछना चाहिए–
थेल्स ने जल को मूल तत्त्व क्यों माना?
अनैक्सिमेण्डर को किसी विशिष्ट पदार्थ के बजाय Apeiron की आवश्यकता क्यों महसूस हुई?
हेराक्लाइटस के लिए परिवर्तन इतना महत्वपूर्ण क्यों था?
पार्मेनाइड्स ने परिवर्तन की समस्या को किस आधार पर चुनौती दी?
ज़ेनो ने गति और परिवर्तन पर तर्क क्यों प्रस्तुत किए?
यही प्रश्न दर्शन को सूचना से चिंतन में बदलते हैं।
1.22 निष्कर्ष
पाश्चात्य दर्शन मनुष्य की उस बौद्धिक यात्रा का परिणाम है जिसमें उसने संसार, प्रकृति, अस्तित्व, ज्ञान और जीवन के मूल प्रश्नों को तर्कपूर्ण ढंग से समझने का प्रयास किया।
Philosophy का शाब्दिक अर्थ प्रज्ञा या ज्ञान के प्रति प्रेम है, किंतु दार्शनिक अर्थ में यह सत्य, ज्ञान, अस्तित्व और मूल्य से संबंधित मूलभूत प्रश्नों का तार्किक, आलोचनात्मक और व्यवस्थित अन्वेषण है।
पाश्चात्य दर्शन की प्रारंभिक व्यवस्थित अभिव्यक्ति प्राचीन यूनान में दिखाई देती है। यहाँ चिंतन धीरे-धीरे मिथकीय व्याख्या से तर्कपूर्ण और प्राकृतिक व्याख्या की ओर बढ़ा। थेल्स, अनैक्सिमेण्डर, अनैक्सिमेनीज़ और पाइथागोरस ने जगत के मूल तत्त्व और उसकी व्यवस्था को समझने का प्रयास किया। आगे हेराक्लाइटस, पार्मेनाइड्स और ज़ेनो के माध्यम से परिवर्तन, सत्ता, गति और तर्क की समस्याएँ अधिक गहरी हुईं।
इस प्रकार प्रारंभिक यूनानी दर्शन की मूल यात्रा को इस सूत्र में समझा जा सकता है–
प्रकृति → मूल तत्त्व → जगत → परिवर्तन → सत्ता → ज्ञान → मनुष्य
और पाश्चात्य दर्शन की व्यापक यात्रा को–
जिज्ञासा → प्रश्न → तर्क → अन्वेषण → सिद्धांत → आलोचना → दार्शनिक बोध
के रूप में देखा जा सकता है।
इस अध्याय के बाद विद्यार्थी के लिए अगला स्वाभाविक प्रश्न है–
जब प्रारंभिक यूनानी दार्शनिकों ने पूछा कि जगत क्या है, तब सुकरात ने प्रश्न को प्रकृति से हटाकर मनुष्य, ज्ञान और सदाचार की ओर क्यों मोड़ा?
यहीं से पाश्चात्य दर्शन की अगली महत्वपूर्ण अवस्था आरंभ होती है।
1.23 अध्याय के मूल दार्शनिक सूत्र
“दर्शन वहाँ आरंभ होता है जहाँ मनुष्य किसी स्वीकृत उत्तर के पीछे छिपे प्रश्न को देखना शुरू करता है।”
“प्रारंभिक यूनानी दर्शन का केंद्रीय प्रश्न था–जगत का मूल क्या है और उसे तर्क के द्वारा कैसे समझा जाए?”
“प्रकृति को समझने की जिज्ञासा से प्रारंभ हुआ यूनानी चिंतन आगे सत्ता, परिवर्तन, ज्ञान और मनुष्य के प्रश्नों तक पहुँचा।”
संक्षिप्त सूत्र
प्रश्न → तर्क → प्रकृति → मूल तत्त्व → सत्ता → परिवर्तन → ज्ञान → मनुष्य
B.A. 1st Western Philosophy | बी. ए. प्रथम वर्ष पाश्चात्य दर्शन
मानस जिले सिंह
【यथार्थवादी विचारक 】
अनुयायी – मानस पंथ, शिष्य – प्रोफेसर औतार लाल मीणा
उद्देश्य – मानवीय मूल्यों की स्थापना हेतु प्रकृति के नियमों का यथार्थ प्रस्तुतीकरण में संकल्पबद्ध योगदान देना।

