B.A. 1st Western Philosophy | बी. ए. प्रथम वर्ष पाश्चात्य दर्शन

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JNVU B.A. 1st Year Western Philosophy – Chapter 1

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अध्याय 2 – पश्चात्य दर्शन

सत्ता, परिवर्तन और विश्व की समस्या: हेराक्लाइटस से डेमोक्रिटस तक

दार्शनिक यात्रा

मूल तत्त्व की खोज
↓
परिवर्तन की समस्या – हेराक्लाइटस
↓
परिवर्तन को नियंत्रित करने वाला Logos
↓
स्थायी सत्ता की समस्या – पार्मेनाइड्स
↓
गति और परिवर्तन पर ज़ेनो की आपत्तियाँ
↓
एकता और बहुलता के समन्वय का प्रयास – एम्पेडोक्लीज़
↓
Nous और विश्व-व्यवस्था – एनाक्सागोरस
↓
परमाणु और शून्य – डेमोक्रिटस
↓
एकता–बहुलता तथा स्थायित्व–परिवर्तन का प्रश्न

यह अध्याय पश्चिमी दर्शन के अध्याय-क्रम में Chapter 1 के स्वाभाविक विस्तार के रूप में है। इसमें Heraclitus, Logos, Parmenides, Zeno, Empedocles, Anaxagoras, Democritus तथा एकता–बहुलता और स्थायित्व–परिवर्तन की समस्या शामिल है।

2.1 भूमिका: Chapter 1 से Chapter 2 तक

पिछले अध्याय में हमने प्रारंभिक यूनानी दार्शनिकों के माध्यम से यह समझने का प्रयास किया था कि विश्व का मूल क्या है?

थेल्स ने जल को, एनाक्सीमेनीज़ ने वायु को और एनाक्सीमैंडर ने Apeiron को मूल तत्त्व के रूप में समझने का प्रयास किया। पाइथागोरस ने संख्या और व्यवस्था की ओर संकेत किया।

लेकिन अब एक नया प्रश्न सामने आता है।

मान लीजिए हमें यह पता चल गया कि विश्व का कोई मूल तत्त्व है। तब भी समस्या समाप्त नहीं होती।

क्योंकि हम देखते हैं कि–

  • पेड़ बढ़ता है,
  • बालक युवा बनता है,
  • युवा वृद्ध होता है,
  • दिन रात में बदलता है,
  • ऋतु बदलती है,
  • वस्तुएँ उत्पन्न होती हैं और नष्ट होती हैं।

इसलिए प्रश्न बदल जाता है–

यदि संसार निरंतर बदल रहा है, तो वास्तविकता क्या है?

क्या परिवर्तन ही वास्तविकता है?

या परिवर्तन के पीछे कोई स्थायी सत्ता है?

यहीं से यूनानी दर्शन का अगला महत्वपूर्ण चरण आरंभ होता है।

2.2 मूल दार्शनिक समस्या: परिवर्तन या स्थायित्व?

हमारे सामान्य अनुभव में दो बातें एक साथ दिखाई देती हैं–

पहली – परिवर्तन

जो वस्तु आज है, वह कल वैसी नहीं रहती।

दूसरी – निरंतरता

फिर भी हम कहते हैं कि वह वही वस्तु है।

उदाहरण के लिए–

आज का एक बालक दस वर्ष बाद युवा बन जाता है।

शरीर बदल गया, विचार बदल गए, अनुभव बदल गए; फिर भी हम कहते हैं–

“यह वही व्यक्ति है।”

तो प्रश्न है–

परिवर्तन के बीच स्थायित्व कैसे संभव है?

यही समस्या आगे चलकर Heraclitus और Parmenides के दर्शन में दो अलग दिशाओं में विकसित होती है।

2.3 हेराक्लाइटस: परिवर्तन ही विश्व का मूल स्वरूप

हेराक्लाइटस (Heraclitus) ने विश्व को स्थिर वस्तुओं का संग्रह न मानकर निरंतर परिवर्तनशील प्रक्रिया के रूप में समझने का प्रयास किया।

उसकी दृष्टि में संसार में कोई पूर्ण स्थिरता नहीं है।

सब कुछ परिवर्तन की प्रक्रिया में है।

इसे सरल सूत्र में कहें–

विश्व = निरंतर परिवर्तन

2.3.1 परिवर्तन का सामान्य अनुभव

एक नदी को देखिए।

आप कहते हैं–

“यह गंगा है।”

लेकिन नदी में बहने वाला जल प्रत्येक क्षण बदल रहा है।

जिस जल को आपने अभी देखा, कुछ समय बाद वह वहाँ नहीं रहेगा।

फिर भी नदी को हम वही नदी कहते हैं।

इस प्रकार नदी का उदाहरण हमें दो बातें दिखाता है–

परिवर्तन भी है और पहचान की निरंतरता भी।

हेराक्लाइटस के दर्शन में यही परिवर्तन अत्यंत महत्वपूर्ण है।

2.4 “सब कुछ प्रवाहमान है” – परिवर्तन का सिद्धांत

हेराक्लाइटस के दर्शन को प्रायः Flux अर्थात् प्रवाह की धारणा से समझाया जाता है।

लोकप्रिय रूप में इसे इस विचार से व्यक्त किया जाता है कि–

सब कुछ प्रवाहित हो रहा है।

नदी का उदाहरण इसी बात को समझाने के लिए उपयोगी है।

आप एक ही नदी में दो बार प्रवेश करते हैं, लेकिन दोनों बार आपके सामने वही जल नहीं होता।

इसका दार्शनिक आशय है–

वास्तविकता को केवल स्थिर वस्तु के रूप में नहीं बल्कि परिवर्तनशील प्रक्रिया के रूप में समझना चाहिए।

2.5 क्या परिवर्तन अव्यवस्था है?

अब एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है।

यदि सब कुछ बदल रहा है, तो क्या संसार में कोई व्यवस्था नहीं है?

यदि हर वस्तु लगातार बदल रही है, तो संसार इतना व्यवस्थित क्यों दिखाई देता है?

दिन के बाद रात आती है।

रात के बाद दिन।

ऋतुएँ एक क्रम में आती हैं।

प्रकृति में अनेक प्रक्रियाएँ निश्चित संबंधों के अनुसार चलती हैं।

इसलिए हेराक्लाइटस के दर्शन में परिवर्तन का अर्थ अव्यवस्था नहीं है।

परिवर्तन के पीछे एक व्यवस्थित सार्वभौमिक नियम है।

यहीं से आता है–

Logos

2.6 Logos क्या है?

Logos का अर्थ संदर्भ के अनुसार–

  • तर्क,
  • वचन,
  • विवेक,
  • नियम,
  • व्यवस्था,
  • सार्वभौमिक सिद्धांत

जैसे अर्थों में समझा जा सकता है।

हेराक्लाइटस के दर्शन में Logos वह सार्वभौमिक व्यवस्था है जो परिवर्तनशील विश्व को एक नियम और सामंजस्य प्रदान करती है।

इसलिए–

परिवर्तन है, लेकिन परिवर्तन अराजक नहीं है।

उदाहरण

ऋतु बदलती है।

ग्रीष्म आता है।

फिर वर्षा।

फिर शरद।

फिर शीत।

यह परिवर्तन है, लेकिन नियमहीन परिवर्तन नहीं।

यही परिवर्तन के भीतर व्यवस्था की समस्या को समझने का आधार है।

2.7 विरोधों की एकता

हेराक्लाइटस के दर्शन में एक और महत्वपूर्ण विचार है–

विरोधी तत्वों के संघर्ष और संबंध से विश्व की गति बनी रहती है।

हम देखते हैं–

  • दिन–रात
  • गर्म–ठंडा
  • जीवन–मृत्यु
  • जागरण–निद्रा
  • सुख–दुःख

इनमें विरोध दिखाई देता है।

लेकिन यदि केवल दिन हो और रात न हो, तो दिन की पहचान भी बदल जाएगी।

इसी प्रकार जीवन और मृत्यु, गर्मी और ठंडक आदि विरोधी अवस्थाएँ विश्व की परिवर्तनशीलता में परस्पर संबंधित हैं।

इसलिए हेराक्लाइटस के यहाँ विरोध केवल संघर्ष नहीं है; वह विश्व की गति और व्यवस्था का अंग है।

2.8 हेराक्लाइटस का दार्शनिक महत्व

हेराक्लाइटस ने दर्शन को एक महत्वपूर्ण दिशा दी–

वास्तविकता को स्थिर वस्तु की अपेक्षा परिवर्तन और प्रक्रिया के रूप में भी समझा जा सकता है।

लेकिन इसी बिंदु पर एक गंभीर आपत्ति उठती है।

यदि सब कुछ बदल रहा है–

तो क्या कोई स्थायी सत्य संभव है?

यदि हर चीज बदलती रहती है, तो हम किसी वस्तु के बारे में निश्चित ज्ञान कैसे प्राप्त करेंगे?

यहीं से दर्शन की दिशा बदलती है।

2.9 पार्मेनाइड्स: परिवर्तन के विरुद्ध स्थायी सत्ता

Parmenides (पार्मेनाइड्स) ने हेराक्लाइटस की परिवर्तन-केंद्रित दृष्टि के विपरीत Being अर्थात् सत्ता को दार्शनिक चिंतन का केंद्र बनाया।

उसका मूल प्रश्न था–

जो वास्तव में है, वह क्या है?

पार्मेनाइड्स के लिए “जो है” उसका होना अनिवार्य है।

और जो “नहीं है”, उसके बारे में हम यथार्थ रूप से विचार कैसे कर सकते हैं?

यहीं से उसका प्रसिद्ध दार्शनिक विभाजन सामने आता है–

Being – जो है

और

Non-being – जो नहीं है

2.10 Being क्या है?

Being का सामान्य अर्थ है–

सत्ता – जो वास्तव में है।

पार्मेनाइड्स के अनुसार वास्तविक सत्ता के बारे में विचार करते समय हमें तर्क का अनुसरण करना चाहिए, केवल इन्द्रिय अनुभव का नहीं।

हमारी इन्द्रियाँ हमें दिखाती हैं–

  • वस्तुएँ उत्पन्न होती हैं,
  • बदलती हैं,
  • नष्ट होती हैं।

लेकिन पार्मेनाइड्स पूछता है–

जो वास्तव में है, वह “नहीं होने” से कैसे उत्पन्न हो सकता है?

यदि कोई वस्तु पहले बिल्कुल नहीं थी और फिर उत्पन्न हुई, तो वह “नहीं” से “है” में कैसे आई?

यहीं उसका तर्क परिवर्तन के विरुद्ध जाता है।

2.11 उत्पत्ति की समस्या

मान लीजिए एक वस्तु उत्पन्न हुई।

प्रश्न–

वह कहाँ से आई?

यदि “जो है” से आई, तो वह पहले से ही थी।

यदि “जो नहीं है” से आई, तो “नहीं” से “है” कैसे उत्पन्न हो गया?

इस प्रकार पार्मेनाइड्स के अनुसार वास्तविक सत्ता को–

  • उत्पन्न होना,
  • नष्ट होना,
  • बदलना

जैसी अवस्थाओं में नहीं रखा जा सकता।

2.12 पार्मेनाइड्स की सत्ता

पार्मेनाइड्स की वास्तविक सत्ता–

  • अजन्मा है,
  • अविनाशी है,
  • अपरिवर्तनशील है,
  • एक है,
  • अखंड है।

अर्थात्–

वास्तविक Being में परिवर्तन की कोई वास्तविक जगह नहीं है।

यह हेराक्लाइटस से बिल्कुल अलग दृष्टि है।

हेराक्लाइटस

वास्तविकता = परिवर्तन

पार्मेनाइड्स

वास्तविकता = स्थायी Being

2.13 ज्ञान की दो राहें

पार्मेनाइड्स के दर्शन में एक महत्वपूर्ण भेद मिलता है–

1. सत्य का मार्ग

तर्क द्वारा प्राप्त ज्ञान।

2. मत का मार्ग

इन्द्रियों पर आधारित सामान्य धारणा।

हमारी इन्द्रियाँ कहती हैं–

संसार बदल रहा है।

लेकिन पार्मेनाइड्स का तर्क कहता है–

वास्तविक सत्ता परिवर्तनशील नहीं हो सकती।

इसलिए यहाँ एक नया दार्शनिक प्रश्न पैदा होता है–

क्या इन्द्रिय अनुभव अधिक विश्वसनीय है या तर्क?

यह प्रश्न आगे चलकर पूरे पश्चिमी दर्शन में बार-बार सामने आएगा।

2.14 हेराक्लाइटस और पार्मेनाइड्स: पहली बड़ी दार्शनिक टकराहट

हेराक्लाइटसपार्मेनाइड्स
परिवर्तन पर बलस्थायित्व पर बल
BecomingBeing
प्रवाहस्थायी सत्ता
विरोधों की गतिएकता
अनुभव की परिवर्तनशीलतातर्क की अनिवार्यता

लेकिन ध्यान देने योग्य बात यह है कि दोनों केवल अलग-अलग उत्तर नहीं दे रहे थे।

दोनों एक ही मूल प्रश्न का उत्तर खोज रहे थे–

वास्तविकता का वास्तविक स्वरूप क्या है?

2.15 ज़ेनो: परिवर्तन और गति की समस्या

पार्मेनाइड्स के विचारों की रक्षा करने के लिए Zeno (ज़ेनो) ने कुछ प्रसिद्ध तर्क प्रस्तुत किए।

उसका उद्देश्य यह दिखाना था कि यदि हम गति और बहुलता को जैसा दिखाई देता है वैसा ही मान लें, तो अनेक तार्किक कठिनाइयाँ उत्पन्न होती हैं।

इसलिए ज़ेनो ने गति (Motion) और बहुलता (Plurality) के विरुद्ध तर्क दिए।

2.16 ज़ेनो का तर्क: गति की समस्या

मान लीजिए कोई व्यक्ति एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाना चाहता है।

उसे पहले आधी दूरी तय करनी होगी।

फिर बची हुई आधी दूरी की आधी।

फिर उसकी आधी।

और यह प्रक्रिया अनंत तक चल सकती है।

तो प्रश्न–

यदि दूरी को अनंत छोटे भागों में विभाजित किया जा सकता है, तो कोई व्यक्ति लक्ष्य तक पहुँचेगा कैसे?

यही ज़ेनो की प्रसिद्ध गति-संबंधी समस्या है।

2.17 अकिलीस और कछुआ

ज़ेनो का प्रसिद्ध उदाहरण है–

Achilles and the Tortoise

मान लीजिए तेज दौड़ने वाला अकिलीस धीमे चलने वाले कछुए को कुछ दूरी की बढ़त देता है।

अकिलीस जब उस स्थान तक पहुँचेगा जहाँ कछुआ था, तब तक कछुआ थोड़ा आगे बढ़ चुका होगा।

अकिलीस उस नई जगह तक पहुँचेगा, तब तक कछुआ फिर थोड़ा आगे होगा।

इस प्रकार सैद्धांतिक रूप से–

अकिलीस को कछुए तक पहुँचने के लिए अनंत चरण पूरे करने पड़ेंगे।

यह तर्क सामान्य अनुभव के विपरीत दिखाई देता है, क्योंकि व्यवहार में अकिलीस कछुए को पकड़ सकता है।

लेकिन ज़ेनो का उद्देश्य व्यावहारिक दौड़ का वर्णन करना नहीं था।

उसका उद्देश्य था–

गति और निरंतरता की तार्किक कठिनाई को सामने लाना।

2.18 ज़ेनो का दार्शनिक महत्व

ज़ेनो हमें यह सिखाता है कि–

जो बात अनुभव में सरल दिखाई देती है, वह तार्किक विश्लेषण में अत्यंत जटिल हो सकती है।

यह पश्चिमी दर्शन में एक महत्वपूर्ण मोड़ है।

अब दर्शन केवल–

“मैंने ऐसा देखा।”

पर निर्भर नहीं रहता।

वह पूछता है–

“तुम्हारे कथन का तार्किक परिणाम क्या है?”

2.19 अब समस्या और गहरी होती है

हेराक्लाइटस कहता है–

सब बदल रहा है।

पार्मेनाइड्स कहता है–

वास्तविक सत्ता बदल नहीं सकती।

ज़ेनो गति को तार्किक कठिनाइयों में डाल देता है।

अब दार्शनिकों के सामने प्रश्न है–

क्या एक ऐसा दर्शन संभव है जो स्थायित्व और परिवर्तन दोनों को समझा सके?

यहीं से अगली दार्शनिक कोशिश शुरू होती है।

2.20 एम्पेडोक्लीज़: एक से अनेक और अनेक से एक

Empedocles (एम्पेडोक्लीज़) ने एक नया समाधान प्रस्तुत किया।

उसने माना कि संसार की व्याख्या किसी एक मूल तत्त्व से नहीं की जा सकती।

उसने चार मूल तत्त्व माने–

  1. पृथ्वी
  2. जल
  3. अग्नि
  4. वायु

इन चारों को सामान्यतः चार मूल तत्त्व (Four Elements) कहा जाता है।

2.21 चार तत्त्व और परिवर्तन

अब प्रश्न है–

यदि ये चार तत्त्व स्थायी हैं, तो परिवर्तन कैसे होता है?

एम्पेडोक्लीज़ के अनुसार–

तत्त्व स्वयं नष्ट नहीं होते; उनका संयोजन बदलता है।

यही बहुत महत्वपूर्ण विचार है।

उदाहरण

मिट्टी से घड़ा बनता है।

घड़ा टूट जाता है।

लेकिन पदार्थ पूरी तरह शून्य नहीं हो जाता।

रूप और संयोजन बदलता है।

इसी प्रकार–

परिवर्तन = स्थायी तत्त्वों के संयोजन में परिवर्तन।

2.22 प्रेम और द्वेष

एम्पेडोक्लीज़ ने विश्व की गति को दो शक्तियों से समझाया–

Love – प्रेम/आकर्षण

जो तत्वों को जोड़ता है।

Strife – संघर्ष/वियोग

जो उन्हें अलग करता है।

सरल उदाहरण:

दो अलग-अलग वस्तुएँ मिलकर एक नई संरचना बनाती हैं।

फिर किसी प्रक्रिया के कारण अलग हो जाती हैं।

इस प्रकार–

संयोजन और वियोजन से परिवर्तन उत्पन्न होता है।

यह हेराक्लाइटस के परिवर्तन और पार्मेनाइड्स के स्थायित्व के बीच एक प्रकार का दार्शनिक समन्वय प्रस्तुत करता है।

2.23 एनाक्सागोरस: Nous और विश्व-व्यवस्था

इसके बाद Anaxagoras (एनाक्सागोरस) ने विश्व की व्याख्या में एक और महत्वपूर्ण तत्व जोड़ा–

Nous

Nous का अर्थ सामान्यतः–

बुद्धि, मन या विश्व-बुद्धि

के रूप में समझा जाता है।

2.24 Nous की आवश्यकता क्यों पड़ी?

यदि संसार में अनेक प्रकार के पदार्थ हैं और उनमें परिवर्तन होता है, तो प्रश्न है–

इन पदार्थों में व्यवस्था कैसे आती है?

एनाक्सागोरस के अनुसार केवल पदार्थों का होना पर्याप्त नहीं है।

विश्व की व्यवस्था को प्रारंभ करने और व्यवस्थित करने वाला एक Nous आवश्यक है।

इस प्रकार–

पदार्थ + व्यवस्था का सिद्धांत

के माध्यम से वह विश्व की संरचना समझाने का प्रयास करता है।

2.25 एक सरल उदाहरण

मान लीजिए आपके सामने बहुत सारी ईंटें, पत्थर, लकड़ी और लोहे के टुकड़े पड़े हैं।

इन पदार्थों के अपने-अपने गुण हैं।

लेकिन केवल उनके एकत्रित होने से अपने-आप एक व्यवस्थित घर नहीं बन जाता।

घर के लिए–

व्यवस्था, योजना और संयोजन

की आवश्यकता होती है।

इसी प्रकार एनाक्सागोरस के दर्शन में Nous विश्व की व्यवस्था को समझने वाला महत्वपूर्ण सिद्धांत है।

2.26 डेमोक्रिटस: परमाणुवाद की ओर

अब तक दार्शनिकों ने–

  • परिवर्तन,
  • स्थायित्व,
  • गति,
  • बहुलता,
  • तत्वों के संयोजन,
  • विश्व-व्यवस्था

जैसी समस्याओं पर विचार किया।

इन समस्याओं के समाधान की दिशा में Democritus (डेमोक्रिटस) ने परमाणुवाद (Atomism) प्रस्तुत किया।

उसके अनुसार विश्व की वस्तुओं को सूक्ष्म, अविभाज्य कणों अर्थात् Atoms और Void (शून्य/रिक्त स्थान) के माध्यम से समझा जा सकता है।

2.27 परमाणु क्या हैं?

“Atom” का मूल आशय है–

जिसे आगे विभाजित नहीं किया जा सके।

डेमोक्रिटस के अनुसार परमाणु–

  • अत्यंत सूक्ष्म हैं,
  • अविभाज्य हैं,
  • शाश्वत हैं,
  • विभिन्न आकार और विन्यास वाले हो सकते हैं।

लेकिन दिखाई देने वाली वस्तुएँ उनके संयोजन से बनती हैं।

2.28 परिवर्तन की समस्या का समाधान

अब ध्यान दें कि डेमोक्रिटस ने हेराक्लाइटस और पार्मेनाइड्स की समस्या को किस प्रकार संबोधित किया।

यदि परमाणु स्वयं स्थायी हैं, तो–

स्थायित्व बना रहता है।

यदि परमाणुओं के–

  • स्थान,
  • गति,
  • संयोजन

बदलते हैं, तो–

परिवर्तन भी संभव हो जाता है।

अर्थात्–

स्थायी परमाणु + बदलते संयोजन = परिवर्तनशील जगत्

यह अत्यंत महत्वपूर्ण दार्शनिक संरचना है।

2.29 एक उदाहरण: मिट्टी का घड़ा

मान लीजिए हमारे सामने मिट्टी का घड़ा है।

घड़ा बनने से पहले मिट्टी दूसरे रूप में थी।

घड़ा बनने के बाद उसका रूप बदल गया।

घड़ा टूटने पर फिर उसका रूप बदल जाएगा।

परमाणुवादी दृष्टि से हम कह सकते हैं–

मूलभूत कण बने रहते हैं, लेकिन उनका संयोजन और व्यवस्था बदलती रहती है।

इस प्रकार परिवर्तन का अर्थ यह नहीं कि “कुछ भी नहीं” से “कुछ” पैदा हो गया।

बल्कि–

स्थायी सूक्ष्म इकाइयों की स्थिति और संरचना बदलती है।

2.30 Void अर्थात् शून्य/रिक्त स्थान

डेमोक्रिटस के परमाणुवाद में केवल परमाणु ही पर्याप्त नहीं हैं।

यदि परमाणु गति करते हैं, तो उनके लिए स्थान भी चाहिए।

इसलिए उसने Void की धारणा को स्वीकार किया।

सरल उदाहरण:

यदि कमरे में केवल वस्तुएँ हों और उनके बीच बिल्कुल कोई स्थान न हो, तो उनका स्थान परिवर्तन कैसे होगा?

इसलिए गति को समझाने के लिए–

परमाणु + रिक्त स्थान

दोनों आवश्यक हैं।

2.31 डेमोक्रिटस और इन्द्रिय अनुभव

एक महत्वपूर्ण प्रश्न है–

यदि परमाणु इतने सूक्ष्म हैं कि दिखाई नहीं देते, तो उनका ज्ञान कैसे होगा?

यहाँ डेमोक्रिटस की दार्शनिक दृष्टि यह दिखाती है कि–

जो वस्तुएँ हमें दिखाई देती हैं, वे अंतिम वास्तविकता का सरल और पूर्ण स्वरूप नहीं भी हो सकतीं।

हम जो अनुभव करते हैं, उसके पीछे सूक्ष्म संरचनाएँ हो सकती हैं।

यह विचार आगे चलकर विज्ञान और दर्शन में पदार्थ की सूक्ष्म संरचना के प्रश्नों से जुड़ने वाला एक महत्वपूर्ण प्रारंभिक दार्शनिक संकेत बनता है।

2.32 एकता और बहुलता की समस्या

अब पूरे अध्याय की एक केंद्रीय समस्या सामने आती है–

क्या वास्तविकता एक है या अनेक?

हेराक्लाइटस परिवर्तन और विरोधों पर बल देता है।

पार्मेनाइड्स एक स्थायी सत्ता पर बल देता है।

एम्पेडोक्लीज़ चार मूल तत्त्व स्वीकार करता है।

डेमोक्रिटस अनेक परमाणु स्वीकार करता है।

इस प्रकार दर्शन धीरे-धीरे–

एकता → बहुलता

की ओर बढ़ता है।

2.33 स्थायित्व और परिवर्तन की समस्या

पूरे अध्याय की दूसरी केंद्रीय समस्या है–

यदि परिवर्तन वास्तविक है, तो स्थायित्व कहाँ है?

इसे चार चरणों में समझ सकते हैं–

हेराक्लाइटस

परिवर्तन वास्तविक है।

पार्मेनाइड्स

वास्तविक सत्ता अपरिवर्तनशील है।

एम्पेडोक्लीज़

मूल तत्त्व स्थायी हैं, संयोजन बदलता है।

डेमोक्रिटस

परमाणु स्थायी हैं, उनकी गति और व्यवस्था बदलती है।

यहीं हमें दार्शनिक विकास दिखाई देता है।

2.34 पूरे अध्याय का तुलनात्मक विकास

दार्शनिककेंद्रीय प्रश्नमुख्य विचार
Heraclitusजगत् कैसे है?परिवर्तन, Logos
Parmenidesवास्तविक सत्ता क्या है?Being, स्थायित्व
Zenoगति कैसे संभव है?गति के विरुद्ध तर्क
Empedoclesएकता और परिवर्तन कैसे संभव हैं?चार तत्त्व
Anaxagorasविश्व में व्यवस्था कैसे आई?Nous
Democritusबहुलता और परिवर्तन की व्याख्या कैसे हो?परमाणु और Void

2.35 दार्शनिक विकास की पूरी श्रृंखला

अब इन सभी दार्शनिकों को अलग-अलग याद करने के बजाय एक ही संवाद के रूप में समझें।

प्रश्न 1

विश्व में परिवर्तन दिखाई देता है।

↓

हेराक्लाइटस

परिवर्तन वास्तविकता का मूल स्वरूप है।

↓

प्रश्न 2

यदि सब बदल रहा है, तो स्थायी सत्य कैसे संभव है?

↓

पार्मेनाइड्स

वास्तविक Being स्थायी है; परिवर्तन इन्द्रियगत प्रतीति है।

↓

प्रश्न 3

यदि परिवर्तन नहीं है, तो गति कैसे समझाएँ?

↓

ज़ेनो

गति को स्वीकार करने पर तार्किक कठिनाइयाँ आती हैं।

↓

प्रश्न 4

क्या स्थायित्व और परिवर्तन दोनों को बचाया जा सकता है?

↓

एम्पेडोक्लीज़

स्थायी चार तत्त्व हैं; उनके संयोजन बदलते हैं।

↓

प्रश्न 5

लेकिन विश्व में व्यवस्था कैसे आती है?

↓

एनाक्सागोरस

Nous विश्व को व्यवस्था प्रदान करता है।

↓

प्रश्न 6

क्या परिवर्तनशील जगत् को सूक्ष्म स्थायी इकाइयों से समझाया जा सकता है?

↓

डेमोक्रिटस

हाँ–परमाणु स्थायी हैं और उनके संयोजन से परिवर्तनशील जगत् बनता है।

2.36 एक बहुत सरल उदाहरण से पूरा अध्याय

मान लीजिए हमारे सामने एक वृक्ष है।

हेराक्लाइटस पूछेगा:

वृक्ष बदल रहा है।

बीज → पौधा → वृक्ष → वृद्धावस्था।

इसलिए परिवर्तन वास्तविक है।

पार्मेनाइड्स पूछेगा:

यदि सब बदल गया, तो “वृक्ष” की पहचान किस आधार पर बनी?

क्या वास्तविक सत्ता केवल परिवर्तन हो सकती है?

ज़ेनो पूछेगा:

परिवर्तन वास्तव में कैसे घटित होता है?

गति को अनंत विभाजनों में बाँटने पर क्या समस्या उत्पन्न होती है?

एम्पेडोक्लीज़ कहेगा:

वृक्ष के भीतर मूलभूत तत्त्व बने रहते हैं; उनके संयोजन बदलते हैं।

एनाक्सागोरस कहेगा:

विश्व में केवल पदार्थ ही नहीं बल्कि व्यवस्था का प्रश्न भी है।

डेमोक्रिटस कहेगा:

वृक्ष की संरचना को सूक्ष्म परमाणुओं और उनके विन्यास से समझा जा सकता है।

इस एक उदाहरण में पूरा अध्याय एक साथ दिखाई देता है।

2.37 इस अध्याय का वास्तविक दार्शनिक महत्व

इस अध्याय का उद्देश्य केवल छह दार्शनिकों के सिद्धांत याद करवाना नहीं है।

इस अध्याय में पहली बार विद्यार्थी पश्चिमी दर्शन की एक अत्यंत महत्वपूर्ण विशेषता को समझता है–

एक दार्शनिक का उत्तर अगले दार्शनिक के लिए नया प्रश्न बन जाता है।

इसे इस प्रकार देखें–

Heraclitus का उत्तर
→ Parmenides की आपत्ति

Parmenides का उत्तर
→ Zeno की रक्षा

Zeno की समस्या
→ Empedocles का समाधान

Empedocles का समाधान
→ Anaxagoras की नई व्याख्या

इन सबके बाद
→ Democritus का Atomism

अर्थात् दर्शन कोई अलग-अलग विचारों का संग्रह नहीं है।

दर्शन प्रश्न और उत्तर की सतत संवादात्मक प्रक्रिया है।

2.38 Chapter 1 और Chapter 2 का संबंध

यहाँ दोनों अध्यायों के बीच अंतर स्पष्ट रखना आवश्यक है।

Chapter 1 का केंद्रीय प्रश्न था–

विश्व का मूल तत्त्व क्या है?

इसलिए वहाँ–

Thales → Anaximander → Anaximenes → Pythagoras

तक की चर्चा हुई।

Chapter 2 का केंद्रीय प्रश्न है–

यदि विश्व परिवर्तनशील है, तो वास्तविकता का स्वरूप क्या है?

इसलिए यहाँ–

Heraclitus → Parmenides → Zeno → Empedocles → Anaxagoras → Democritus

की यात्रा होगी।

इससे दोनों अध्यायों में अनावश्यक पुनरावृत्ति नहीं होगी। आपके अपलोड किए हुए पाठ्यक्रम-ढाँचे में भी Chapter 2 को Chapter 1 की बात दोहराने के बजाय उसके आगे विकसित करने के रूप में रखा गया है।

2.39 अध्याय का दार्शनिक सार

इस पूरे अध्याय को यदि पाँच शब्दों में समेटें–

परिवर्तन → सत्ता → गति → बहुलता → परमाणु

मानस जिले सिंह
【यथार्थवादी विचारक 】
अनुयायी – मानस पंथ, शिष्य – प्रोफेसर औतार लाल मीणा
उद्देश्य – मानवीय मूल्यों की स्थापना हेतु प्रकृति के नियमों का यथार्थ प्रस्तुतीकरण में संकल्पबद्ध योगदान देना।

www.sakshiyoga.org

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