Meaning of Sakshi Yoga | साक्षी योग की अवधारणा

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साक्षी योग का अर्थ | साक्षी योग की अवधारणा
Meaning of Sakshi Yoga| Sakshi Yoga Ka Arth | Sakshi Yoga Ki Avdharna

|| Meaning of Sakshi Yoga ||

साक्षी योग

साधना-पद्धति (पंच-स्तरीय):

  1. आत्म-अवलोकन        : मनोवैज्ञानिक शुद्धि और गुण-दोष विवेचन।
  2. मानवीय मूल्य-स्थापन  : अहिंसा, करुणा और न्याय जैसे अनिवार्य नैतिक आधार।
  3. प्रकृति-समर्पण         : अहंकार का शिथिलीकरण। (प्रकृति की चराचर संपत्ति के प्रति प्रेमपूर्वक समर्पण)
  4. शून्य-अभ्यास          : प्रतिक्रियारहित साक्षी भाव।
  5. मौन और मोक्ष        : विचारातीत स्थिरता की प्राप्ति।
  • प्रथम तल  :- आत्म-अवलोकन  आत्मस्वरूप को जानने की प्रक्रिया (मैं कौन हूँ) –

यानि मैं यहाँ शारीरिक/ स्थूल से नहीं अपितु विचार शक्ति के पुंज यानि आत्म तत्व की तरफ ध्यान केंद्रित करना है।

अस्तित्व नहीं स्वयं के गुणों और अवगुणों को जानने का प्रयास भर है।

आत्मविश्लेषण की विशेष प्रक्रिया –

मौजूदा गुणों के साथ जीवन पथ पर आगे निसंकोच बढ़ा जा सकता है? यानि गुणों की पर्याप्तता सहजता प्रदान कर रही है?

लक्ष्योन्मुखी ध्येय प्रक्रिया –

लक्ष्योन्मुखी बने रहने के लिए हमें किन किन क्षेत्र पर ध्यान देने की आवश्यकता है और इसे बड़ी ही गंभीरता से लिया जाना चाहिये।

आंकलन प्रक्रिया –

किन गुणों के विकास पर बल देना चाहिये और किसे (गुण) अपने जीवन में सम्मिलित करने की आवश्यकता है और किन आदतों को तुरंत प्रभाव से त्याग देने की जरूरत है।

प्रकृति तत्व से आत्मसात प्रक्रिया –

जब मन, बुद्धि, भावनाएँ और चेतना में संतुलन स्थापित हो जाता है। व्यक्ति के भीतर आंतरिक एकता विकसित हो जाती है। उपरोक्त प्रक्रिया करने के उपरांत यह आभास करना की जो मैंने जाना है वो बेहतर नहीं अद्भुत भी है अकल्पनीय और अद्वितीय भी। इस आनंदयुक्त, ओजस्वी और अंतर्मुखी विचार को “ॐ मनः अधिष्ठाय नमः” के साथ बार बार अभ्यास करते हुये उसे अपने जीवन में आत्मसात करना। यह मंत्र आपके विचारों को एकाग्रचित करने में सहायक सिद्ध होता है।

द्वितीय तल :- [अहिंसा, करुणा, पवित्रता, निष्पक्षता, न्याय] मानवीय मूल्य में आस्था    

साधारण शब्दों में जो व्यवहार आप अपने लिए विचार और व्यावहारिकता में लाना चाहते हैं उसे दूसरों के लिए पहले उपलब्ध करवाने के लिए प्रतिबद्ध या लाने हेतु वचनबद्धता दिखनी चाहिये।

  • तृतीय तल :- प्रकृति में ही समर्पण की स्वीकार्यता   

साधारण शब्दों में ईश्वरीय या प्रकृति द्वारा उत्पन्न सभी जीव, प्राणियों के प्रति कृतज्ञ होना चाहिये। 

  • चतुर्थ तल :- [विश्वास, प्रेम, क्षमा] को आत्मसात कर शांति की साधना से शून्य की ओर प्रस्थान 

साधारण शब्दों में शांत चित् रखते हुये सम भाव की तरफ अग्रसर होना चाहिये।   

  • पंचम तल :- [सत्य और मौन] ब्रह्म मार्ग से जीवनोन्मुख मोक्ष

साधारण शब्दों में प्रकृति के नियम में विश्वास, निस्वार्थ प्राणियों से प्रेम, किसी भी प्रकार के बने आलोचक या विरोधी या असहजता के भाव को पैदा करने वाले को क्षमा का दान, ब्रह्म ही एक मात्र सत्य है उसकी स्व स्वीकृति और उसके उपरांत हर वस्तु विचार से निर्लिप्तता ईश्वर से मिलने की चाह से भी निवृत्ति ही मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करती है। इस कड़ी दर कड़ी बने संकल्पित लक्ष्य को सुव्यवस्थित, सुचारु और संयमित निभाने की प्रक्रिया को ही साक्षी योग कहते हैं।

“आत्म-अवलोकन से लेकर मानवीय जीवन को बेहतर बनाने हेतु संकल्पबद्धता, प्रकृति तत्व में समर्पण, शांत चित्त से समभाव, अनन्य व अटूट विश्वास, निरंतर निस्वार्थ व निश्चल प्रेम, निसंकोच क्षमा, सत्य में ही आस्था और ऊपर से हर चाह निवृत्ति होकर मौन हो जाने सम्पूर्ण विधि का नाम ही साक्षी योग है।”

योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः।
– योगसूत्र 1.2


तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्।

– योगसूत्र 1.3


योगः कर्मसु कौशलम्।
-भगवद्गीता 2.50


समत्वं योग उच्यते।
– भगवद्गीता 2.48


एको देवः सर्वभूतेषु गूढः
सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा।
कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः
साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च॥

– श्वेताशवर उपनिषद 6.11

साक्षी योग में उपरोक्त पाँच श्लोक केन्द्रीय भूमिका में रहते हैं। परिणामस्वरूप वह योगी बन जाता है जिसे अगला श्लोक परिभाषित कर्ता है।


यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते।
निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा॥

– भगवद्गीता 6.18

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साक्षी योग का अर्थ | साक्षी योग की अवधारणा

मानस जिले सिंह
【यथार्थवादी विचारक 】
अनुयायी – मानस पंथ , शिष्य – प्रोफेसर औतार लाल मीणा
उद्देश्य – मानवीय मूल्यों की स्थापना हेतु प्रकृति के नियमों का यथार्थ प्रस्तुतीकरण में संकल्पबद्ध योगदान देना।

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2 COMMENTS

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