Sunday, April 21, 2024

Definition of Philosophy | दर्शन की परिभाषा

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दर्शन की परिभाषा | दर्शन का अर्थ
Definition of Philosophy | Darshan Ka Arth | Darshan Ki Paribhasha
“” दर्शन “”
“” मानवीय जीवन जीने की कला ही दर्शन है। “”
“” वचन और कर्म की व्यवहारिकता में प्रदर्शन ही आपका दर्शन कहलाता है। “”
“” द “” से दक्षता / कार्यकलाप जहां साबित करने के लिए मेहनत करनी पड़े,
वहाँ हुनर में निखार के साथ त्रुटि भी धीरे धीरे कम होने लगती है ;
“” र “”  से रीति नीति जहां आपके आचरण को गढ़ने लगे,
वहाँ सोच समझकर ही विचारों का चयन होना चाहिए ;
“” श “‘ से शिष्टता जहां आपके व्यवहार से झलकती हो,
वहाँ जिंदादिली आपकी आँखों से टपकती है ;
“‘ न “‘ से नित्यकर्म जहां अपने लक्ष्यों की पूर्ति के लिए समर्पित हो,
वहाँ सफलता के साथ अकल्पनीय घटित होना हैरान नहीं करता ;
“” वैसे दक्षता व रीति नीति का शिष्टता से नित्यकर्म करना ही दर्शन कहलाता है। “”
मानस  के अंदाज में –
“” ज्ञान से प्रेम के चरितार्थ में अन्य विचारों से निज विचार को श्रेष्ठ सिद्ध करने के तर्क ही दर्शन कहते हैं। “”
“” दर्शन कोई आसमानी या जादुई तरीका नहीं है बस जिसकी जीवनी बेहतर व अनुसरणीय थी वो किताबों में दर्ज हो गई। “”
These valuable are views on Definition of Philosophy |Darshan Ka Arth | Darshan Ki Paribhasha .

दर्शन की परिभाषा | दर्शन का अर्थ

मानस जिले सिंह
【 यथार्थवादी विचारक】
अनुयायी – मानस पँथ
उद्देश्य – समाज में शिक्षा, समानता व स्वावलंबन के प्रचार प्रसार में अपनी भूमिका निर्वहन करना।

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Devender
2 years ago

गज़ब है

Manas Shailja
Member
2 years ago

great thought

Sarla Jangir
Sarla Jangir
1 year ago

“तुम तुंग हिमालय श्रृंग
और मैं चंचल गति सुर सरिता
तुम विमल हृदय उचछवास
और मैं कांत कामिनी कविता
तुम प्रेम और मैं शांति
तुम सुरा पान घन अंधकार
और मैं मतवाली भ्रांति। ”
– निराला जी
निराला जी ने अध्यात्म और काव्य का सुंदर समन्वय किया है। यह भी एक तरह दर्शन ही है, जिसमें कवि ने अपने आप को अपूर्ण माना है और उस विराट पुरुष को प्रकाशमय, पूर्ण, सत्य बहुत सी उपमाओं से सुशोभित किया है। हमने और आपने यह सब सिर्फ कविताओं में पढ़ा है ।अगर इस सत्य में स्वीकार किया जाए तो मनुष्य का स्वरूप भी कुछ भिन्न तरह का होगा । अपने आपसे किसी और को ऊपर मानना ही एक सच्चे मनुष्य की निशानी है। एक मनुष्य में 6 बुरे गुण होते हैं ।उसमें से क्रोध, मद ,मत्सर और लोभ अपने से ऊपर किसी के सत्ता स्वीकार करने से वे खत्म हो जाते हैं। महात्मा बुद्ध को जब ज्ञान की प्राप्ति ज्ञान की प्राप्ति हुई ,तब उन्होंने अपने मुख से मानव- धर्मों को उजागर किया ।मानवता में निहित गुण- दर्शन है और उसे करने वाला दार्शनिक । – प्रोफेसर सरला जांगिड़

Manas Jilay Singh
Reply to  Sarla Jangir
1 year ago

बहुत ही सुंदर व्याख्यान जिसमें कवि की श्रेष्ठ पंक्तियों का वर्णन भी किया है आपके विचारों में भाषा व दर्शन दोनों की झलक दिखती है।

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