Monday, January 26, 2026

Dr B R Ambedkar | भाग्यविधाता या संजीवनी

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भाग्यविधाता की परिभाषा | संजीवनी का अर्थ
Dr B R Ambedkar | Definition of Fortune Teller | Sanjivani Ki Paribhasha

 | समाज के लिये भाग्यविधाता या जातिगत कुचक्र व्यवस्था की संजीवनी या अंग्रेजी हकूमत के संविधान का संशोधन प्रदाता |

“” डॉ भीम राव जी अम्बेडकर अस्पृश्यता के शिकार ,
या कुंठित जातिगत व्यवस्था के कुचक्र में फंसे एक बहुसंख्यक समुदाय की स्थिति का परिचय करवाती व्यवस्था से रूबरू

डॉ अम्बेडकर द्वारा कुछ विशेष समुदायों को सुरक्षित करने हेतु राजनैतिक व आर्थिक आरक्षण दिलवाना
या जातिगत व्यवस्था के घृणित स्वरूप का पुख्ता इंतजाम करना

डॉ अम्बेडकर की समानता नीति एक समुदाय विशेष के विकास के लिए संघर्ष
या अन्य समुदायों के साथ महिलाओं की बद्दतर स्थिति के लिए उपेक्षित नजरिये का परिचय

डॉ अम्बेडकर द्वारा वर्ग विशेष को सम्मान दिलाने में अव्यावहारिक तरीके का इस्तेमाल या प्रयास
या फिर धार्मिक कुचक्र की बेड़ियों में दम तोड़ती इच्छा शक्ति का परिचय दिखलाती बौद्ध धर्म की स्वीकार्यता।

वैसे उच्च स्तरीय शिक्षा के धनी होने के बावजूद कठिनाई भरे संघर्ष में समाज के लिए जितना किया वो कुछ हद सही ठहराया जा सकता है ,

परन्तु मेरी नज़र में उस वक़्त की परिस्थितियों व योग्यता के अनुरूप योगदान ऊँट के मुँह में जीरे के समान ही दिखाई देता है।

उनकी मानसिक पीड़ा एक समुदाय समाज श्रेष्ठ , सम्मान व समानता का अधिकार दिलाना था —

“” मेरा मानना सभी नागरिकों को शिक्षा 【 शैक्षणिक व व्यावसायिक 】 व दक्षता 【हस्तकौशल 】 का कानूनी व समान अधिकार 【 स्कूल व डिग्री महाविद्यालय व विश्वविद्यालय 】 होता तो स्वावलंबन के साथ समानता व सम्मान अपने आप मिल जाता।

सम्मान देना दूसरे व्यक्ति के अधिकार क्षेत्र में आता है पर स्वयं को भी श्रेष्ठ मानने से कुछ हद तक सम्भव है,
दूसरे की श्रेणी में शामिल होने की चाह स्वंय को कमतर या निकृष्ट बनाती है। “

“” छुआछूत समाज के लिए वह केंसर है जिसका इलाज वर्णमुक्त समाज व धर्म संम्भाव है “”

“” हर जाति और धर्म के श्रेष्ठता की अंधी दौड़ ने मानवता व सर्वकल्याण को पीछे छोड़ दिया है ;
अतः रूढ़िवादी व अंधविश्वासी विचारधारा मुक्त जीवन ही सच्ची प्रकृति सेवा व “” मानस “” की परिकल्पना है। “”

“” अस्पृश्यता मानवीय जीवन के लिए कोढ़ है व इसे मिटाने के प्रयास में जीवन की पूर्ण आहुति देनी पड़ी तो मैं पीछे नहीं हटना चाहूँगा “”

“” यह मेरे जीवन का एक लक्ष्य भी है और “” मानस “” की विचारशक्ति भी “”

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मानस जिले सिंह
【 यथार्थवादी विचारक】
अनुयायी – मानस पँथ
उद्देश्य – समाज में शिक्षा, समानता व स्वावलंबन के प्रचार प्रसार में अपनी भूमिका निर्वहन करना।

4 COMMENTS

  1. आज के परिपेक्ष्य के मुताबिक आपके विचार सही हैं,

    परंतु मेरे विचार मे आजादी के समय अपने देश की जो व्यवस्था रही उस वक्त डॉक्टर भीमराव जी अंबेडकर ने रियासतों के एकीकरण के लिए पूरे देश में विभिन्न समाज के संप्रदाय के रहन-सहन ऊंच-नीच व जातिगत व्यवस्था देखी उस समय के मुताबिक पिछड़े वर्गों को बराबर लाने के लिए ऐसी व्यवस्था जरूरी थी अन्यथा धर्मावलंबियों वह रसूखदारों द्वारा जो नियम व कानून हांके जा रहे थे उनके अनुसार आज तक हिंदू मंदिरों में न कभी मुख्य पुजारी, मस्जिदों में न कभी मुख्य मौलवी तथा चर्च में न कभी मुख्य पादरी कोई महिला या पिछड़े वर्ग का आसीन हुआ हो,

    उन्हीं की ही देन है कि आज उच्च पदों जैसे प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, चीफ जस्टिस, मुख्यमंत्री, सचिव आदि पदों पर महिलाएं वह पिछड़े वर्गों के लोग आसीन है।

    अगर संविधान में इन वर्गों के लिए जगह नहीं होती तो ऐसा कभी संभव नहीं होता।

    परंतु आज के इस वैज्ञानिक युग में यह सब बेईमानी सा प्रतीत होता है,

    क्यों कि आज के समय में केवल योग्यतम की उत्तरजीविता है जो देश व समाज को उच्चतम ऊंचाइयों तक ले जा सके चाहे वह किसी भी जाति धर्म व संप्रदाय से संबंधित क्यों ना हो।

  2. अस्पृश्यता के अनेक आयाम हैं अतः केवल अच्छा रोजगार हर समस्या का हल नहीं हो सकता है ।हर नीति या निर्णय के कुछ भावी कुप्रभाव होते हैं जिनको दूर करने की जिम्मेदारी हमारी पीढ़ी की है । मेरे विचार में तात्कालिक परिस्थितियों में देश के निर्माण में उनका योगदान उल्लेखनीय है। आधुनिक भारत में निर्विवाद रूप से वे बहुसंख्यक लोगों के मसीहा हैं।

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