Saturday, February 14, 2026

Meaning of Sakshi Mantra | साक्षी मंत्र का अर्थ

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ॐ मनः अधिष्ठाय नमः का अर्थ | साक्षी मंत्र का अर्थ
Meaning of Sakshi Mantra | Definition of Sakshi Mantra | Sakshi Mantra ka Bhavarth

|| Meaning of Sakshi Mantra ||

ॐ मनः अधिष्ठाय नमः

1. शाब्दिक अर्थ

  • ॐ: यह ‘प्रणव’ अक्षर है, जो ब्रह्मांड की आदि ध्वनि, परम ब्रह्म, परमतत्त्व और परमात्मा का प्रतीक है।
  • मनः (Manah): संकल्प, विकल्प, भावनाएं और विचारों का केंद्र, संकल्प-विकल्प करने वाली अंतःकरण वृत्ति
  • अधिष्ठाय (Adhisthaya): इसका अर्थ है आश्रय लेकर, अधिष्ठाता होकर या नियंत्रण में लेकर/बैठकर।
  • नमः (Namah): इसका अर्थ है नमस्कार, नमन, समर्पण, अहंकार-त्याग ।

“ॐ – उस परम तत्त्व को नमन, जो मन को अधिष्ठान बनाकर (या मन पर अधिष्ठित होकर) स्थित है।”

अथवा “मैं उस परम चेतना को नमन करता हूँ जो मन का आधार, साक्षी और नियंता है।”

2. भावार्थ (आंतरिक अर्थ)

(क) दार्शनिक भाव

यह मंत्र स्पष्ट करता है कि –

  • मन स्वयं सत्य नहीं है,
  • मन चेतना से प्रकाशित है,
  • उस चेतना का नाम ही ब्रह्म / आत्मा है।

मन चलता है, बदलता है, भटकता है,
पर जो मन को जानता है, देखता है, नियंत्रित करता है, वही सत्य है।

भाव यह है:

मैं मन नहीं हूँ, मैं मन का साक्षी ब्रह्म हूँ।”

(ख) साधनात्मक भाव

यह मंत्र साधक को यह भाव देता है कि –

  • मन को ईश्वर के चरणों में अधिष्ठित कर दो
  • मन पर मैं (अहं) का अधिकार नहीं, ब्रह्म का अधिकार है
  • समर्पण से ही मन शुद्ध होता है

3. भारतीय दर्शन से संबंध

(क) कठोपनिषद

मनसा एव अनुद्रष्टव्यम्” बृहदारण्यक उपनिषद् (४.४.१९) , यजुर्वेद
(आत्मा मन से ही जानी जाती है, पर मन स्वयं आत्मा नहीं है)

यह मंत्र यही कहता है कि –

  • आत्मा मन का अधिष्ठान है
  • मन आत्मा का साधन है, स्वामी नहीं

(ख) केनोपनिषद

“यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम्।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते॥”। केनोपनिषद् (१.५), सामवेद

जो मन से ग्रहण नहीं किया जा सकता, किंतु जिसके द्वारा मन को जाना या समझा जाता है, वही ब्रह्म है। “मनः अधिष्ठाय” इसी का सार है।

(ग) अद्वैत वेदान्त की दृष्टि

अद्वैत में –

  • मन = जड़ उपकरण
  • आत्मा = चैतन्य साक्षी

यह मंत्र अहंकार-त्याग का मंत्र है।

“मैं मन नहीं हूँ,
मन मुझमें अधिष्ठित है।”

4. भगवद्गीता से संबंध

(क) गीता 6.5

“उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः”।

मन को ऊँचा उठाओ –
क्योंकि आत्मा ही मन का अधिष्ठान है।

(ख) गीता 15.15

सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टः”

मैं सबके हृदय में स्थित हूँ –
यानी मन के भीतर भी वही परमात्मा अधिष्ठित है।

() गीता 15.9

श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च ।
अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते ॥15.9॥

“श्रोत्र (कान), चक्षु (आँख), त्वचा, रसना (जीभ) और घ्राण (नाक) तथा मन का आश्रय लेकर ही यह जीवात्मा विषयों (शब्द, रूप, स्पर्श, रस और गंध) का सेवन करता है।”

“ॐ मनः अधिष्ठाय नमः” सिर्फ एक मंत्र नहीं यह अध्यात्म की साधना पद्धति का आधार है जिसकी नींव पर आत्मविश्लेषण से आत्मिकविकास और फिर अध्यात्म की सीढ़ी से मोक्ष तक का सफर परिलक्षित होता है|

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मानस जिले सिंह
【यथार्थवादी विचारक 】
अनुयायी – मानस पंथ , शिष्य – प्रोफेसर औतार लाल मीणा
उद्देश्य – मानवीय मूल्यों की स्थापना हेतु प्रकृति के नियमों का यथार्थ प्रस्तुतीकरण में संकल्पबद्ध योगदान देना।

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