अनुमिति | अनुमान का सिद्धांत
Theory of Inference | Theory of Estimation| Theory of Deduction | Theory of Reasoning
|| Theory of Inference ||
अनुमान का सिद्धांत
व्याप्ति के आधार पर अप्रत्यक्ष यथार्थज्ञान की न्याय-पद्धति
न्याय दर्शन में अनुमान ज्ञान प्राप्ति का एक महत्त्वपूर्ण प्रमाण है। प्रत्यक्ष में वस्तु या धर्म हमारे सामने उपस्थित होकर ज्ञात होता है जबकि अनुमान में किसी ज्ञात हेतु के आधार पर उस साध्य का ज्ञान होता है जो उस समय प्रत्यक्ष नहीं है। इसलिए अनुमान का मूल क्षेत्र ही वह है जहाँ प्रत्यक्ष की सीमा समाप्त होती है और व्याप्ति-आधारित ज्ञान आरम्भ होता है।
सरल रूप में कहा जा सकता है–
ज्ञात हेतु और साध्य के बीच स्थापित व्याप्ति के आधार पर अप्रत्यक्ष साध्य का यथार्थज्ञान अनुमान है।
न्याय परम्परा के प्रसिद्ध उदाहरण में पर्वत पर धुआँ दिखाई देता है, अग्नि दिखाई नहीं देती फिर भी धूम और अग्नि की व्याप्ति के आधार पर पर्वत पर अग्नि का ज्ञान होता है। मूल सामग्री में भी अनुमान की यही संरचना–पक्ष, साध्य, हेतु, व्याप्ति और परामर्श–को आधार बनाया गया है।
1. अनुमान की आवश्यकता: प्रत्यक्ष से अप्रत्यक्ष की ओर
मानव का समस्त ज्ञान प्रत्यक्ष पर निर्भर नहीं है। हम अनेक ऐसी वस्तुओं, घटनाओं और धर्मों को जानते हैं जो उस क्षण हमारी इन्द्रियों के सामने उपस्थित नहीं होते।
कल्पना कीजिए–
आप दूर स्थित पर्वत की ओर देखते हैं। पर्वत पर धुआँ दिखाई देता है, लेकिन आग दिखाई नहीं देती। फिर भी आप कहते हैं–
“पर्वत पर आग है।”
यहाँ एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठता है–
जब आग प्रत्यक्ष दिखाई नहीं दी, तब उसका ज्ञान कैसे हुआ?
उत्तर है–धूम और अग्नि के बीच पूर्वस्थापित व्याप्ति के ज्ञान के आधार पर।
हम पहले से जानते हैं–
जहाँ धुआँ है, वहाँ आग है।
अब पर्वत पर धुआँ दिखाई देता है। उस धुएँ को पूर्वज्ञात व्याप्ति से जोड़ा जाता है और पर्वत पर अग्नि का ज्ञान उत्पन्न होता है। यही अनुमान की मूल प्रक्रिया है।
इस प्रकार अनुमान केवल “अनुमान लगा लेना” नहीं है। न्याय दर्शन का अनुमान निश्चित व्याप्ति पर आधारित प्रमाणित ज्ञान-प्रक्रिया है।
2. अनुमान की मूल संरचना: पक्ष, साध्य, हेतु और व्याप्ति
अनुमान को ठीक से समझने के लिए चार आधारभूत संकल्पनाओं को स्पष्ट करना आवश्यक है–
2.1 पक्ष (Pakṣa)
जिस विषय या आश्रय में किसी धर्म को सिद्ध करना है, उसे पक्ष कहते हैं।
पर्वत–धुआँ–आग के उदाहरण में–
पर्वत = पक्ष
अर्थात् हम पर्वत के विषय में कुछ सिद्ध करना चाहते हैं। मूल पाठ में भी पर्वत को पक्ष और आग को साध्य के रूप में निर्धारित किया गया है।
2.2 साध्य
जिस धर्म या तथ्य को पक्ष में सिद्ध करना है, वह साध्य है।
यहाँ–
अग्नि = साध्य
क्योंकि पर्वत पर आग का होना सिद्ध किया जाना है।
इसलिए–
साध्य = जिसे सिद्ध करना है।
2.3 हेतु
जिस ज्ञात धर्म के आधार पर साध्य की स्थापना की जाती है, उसे हेतु कहते हैं।
यहाँ–
धुआँ = हेतु
क्योंकि पर्वत पर दिखाई देने वाला धुआँ हमें अग्नि के ज्ञान तक ले जाता है।
इसी को लिङ्ग या अनुमान का चिह्न भी कहा जाता है।
हेतु = वह ज्ञात लक्षण जिसके आधार पर साध्य का ज्ञान उत्पन्न होता है।
2.4 व्याप्ति
हेतु और साध्य के बीच स्थापित निश्चित एवं अनिवार्य सहचर्य-संबंध को व्याप्ति कहते हैं।
उदाहरण–
जहाँ-जहाँ धुआँ है, वहाँ-वहाँ अग्नि है।
यहाँ–
- धुआँ = हेतु
- अग्नि = साध्य
- धूम–अग्नि का अनिवार्य संबंध = व्याप्ति
मूल अनुमान-पाठ भी स्पष्ट करता है कि व्याप्ति स्वयं अनुमान नहीं है बल्कि अनुमान की आधारभूत शर्त है।
इसलिए चारों को एक साथ याद रखें–
पक्ष = पर्वत
हेतु = धुआँ
साध्य = अग्नि
व्याप्ति = जहाँ धुआँ, वहाँ अग्नि
3. व्याप्ति से अनुमान तक: वास्तविक ज्ञान-प्रक्रिया
अब अनुमान की सबसे महत्त्वपूर्ण दार्शनिक प्रक्रिया को समझना आवश्यक है।
केवल धुआँ देख लेने से अनुमान पूरा नहीं हो जाता। केवल व्याप्ति का ज्ञान भी अनुमान नहीं है। दोनों के बीच एक विशिष्ट मानसिक बोध उत्पन्न होता है जिसे न्याय दर्शन में परामर्श कहा जाता है।
इस प्रक्रिया को क्रमशः देखें।
चरण 1: पक्ष में हेतु का प्रत्यक्ष ज्ञान
हम देखते हैं–
“पर्वत पर धुआँ है।“
यहाँ धुआँ प्रत्यक्ष रूप से ज्ञात हुआ।
चरण 2: व्याप्ति का ज्ञान
हमें पहले से ज्ञात है–
“जहाँ धुआँ है, वहाँ अग्नि है।“
यह धूम–अग्नि की व्याप्ति है।
चरण 3: परामर्श
अब हमारे सामने यह विशेष बोध उत्पन्न होता है–
“पर्वत पर उपस्थित यह धुआँ अग्नि से व्याप्त है।“
अर्थात् पक्ष में उपस्थित हेतु को उसकी साध्य के साथ स्थापित व्याप्ति से जोड़ा जाता है।
यही परामर्श है।
चरण 4: अनुमिति
परामर्श के आधार पर निष्कर्ष उत्पन्न होता है–
“अतः पर्वत पर अग्नि है।“
इस निष्कर्षात्मक ज्ञान को अनुमिति कहा जाता है।
मूल सामग्री भी इसी क्रम को प्रत्यक्ष ज्ञान → व्याप्ति-ज्ञान → परामर्श → अनुमान के रूप में प्रस्तुत करती है।
स्मरण-सूत्र
पक्ष में हेतु → व्याप्ति-स्मरण → परामर्श → साध्य का ज्ञान
4. अनुमान, परामर्श और अनुमिति में अंतर
यहाँ एक सूक्ष्म लेकिन अत्यंत महत्त्वपूर्ण दार्शनिक भेद समझना चाहिए।
| संकल्पना | अर्थ |
| अनुमान | साध्य के अप्रत्यक्ष ज्ञान को उत्पन्न करने वाला प्रमाण |
| हेतु | अनुमान का ज्ञात आधार या लिङ्ग |
| व्याप्ति | हेतु और साध्य का अनिवार्य संबंध |
| परामर्श | पक्ष में उपस्थित हेतु को व्याप्ति से संयुक्त रूप में ग्रहण करना |
| अनुमिति | परामर्श से उत्पन्न साध्य का यथार्थज्ञान |
इसलिए–
व्याप्ति कारण-संबंध को उपलब्ध कराती है, परामर्श उस संबंध को वर्तमान पक्ष से जोड़ता है और अनुमिति साध्य का ज्ञान उत्पन्न करती है।
BA स्तर पर इसे सरल सूत्र में ऐसे समझना उपयोगी है–
व्याप्ति + पक्ष में हेतु की उपस्थिति + परामर्श → अनुमिति
5. न्याय का पंचावयवी अनुमान
न्याय दर्शन अनुमान को दूसरे व्यक्ति के सामने व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत करने के लिए पाँच अवयवों का प्रयोग करता है।
पर्वत–धुआँ–अग्नि के उदाहरण से समझें।
1. प्रतिज्ञा
पर्वतो वह्निमान्।
पर्वत अग्निमान् है।
यह वह कथन है जिसे सिद्ध करना है।
2. हेतु (Hetu)
धूमवत्त्वात्।
क्योंकि पर्वत पर धुआँ है।
यह साध्य की स्थापना का आधार प्रस्तुत करता है।
3. उदाहरण
यो यो धूमवान् स वह्निमान्, यथा महानसम्।
जहाँ-जहाँ धुआँ है, वहाँ-वहाँ अग्नि है, जैसे रसोईघर में।
यहाँ व्याप्ति को उदाहरण द्वारा स्पष्ट किया जाता है।
4. उपनय
तथा चायं पर्वतो धूमवान्।
और यह पर्वत भी धूमवान् है।
अर्थात् उदाहरण में स्थापित संबंध को वर्तमान पक्ष पर लागू किया जाता है।
5. निगमन (Nigamana)
तस्मात् पर्वतो वह्निमान्।
अतः पर्वत अग्निमान् है।
यह अंतिम निष्कर्ष है।
मूल पाठ में पंचावयव को इसी क्रम–प्रतिज्ञा → हेतु → उदाहरण → उपनय → निगमन–में दिया गया है।
पाँचों अवयवों का कार्य
| अवयव | कार्य |
| प्रतिज्ञा | क्या सिद्ध करना है? |
| हेतु | क्यों सिद्ध करना है? |
| उदाहरण | व्याप्ति क्या है? |
| उपनय | व्याप्ति इस पक्ष पर कैसे लागू है? |
| निगमन | अंतिम निष्कर्ष क्या है? |
स्मरण-सूत्र
कथन → कारण → नियम → प्रयोग → निष्कर्ष
6. क्या पंचावयव ही अनुमान की आंतरिक प्रक्रिया है?
यहाँ एक सूक्ष्म अंतर ध्यान में रखना चाहिए।
पंचावयव अनुमान की तार्किक प्रस्तुति है जबकि व्यक्ति के मन में अनुमान का वास्तविक ज्ञान उत्पन्न होने की प्रक्रिया को परामर्श और अनुमिति के माध्यम से समझाया जाता है।
इसलिए–
आंतरिक ज्ञान-प्रक्रिया:
प्रत्यक्ष हेतु → व्याप्ति → परामर्श → अनुमिति
परार्थ प्रस्तुति:
प्रतिज्ञा → हेतु → उदाहरण → उपनय → निगमन
यह भेद अनुमान के सिद्धांत को केवल पाँच वाक्यों की रचना मानने से बचाता है।
7. अनुमान और व्याप्ति का संबंध
पिछले अध्याय में हमने व्याप्ति को अनुमान की आधारभूमि के रूप में समझा था। यहाँ दोनों के संबंध को स्पष्ट करना आवश्यक है।
व्याप्ति स्वयं अनुमान नहीं है।
व्याप्ति का अर्थ है–
हेतु और साध्य के बीच निश्चित एवं अनिवार्य संबंध का ज्ञान।
जब उस व्याप्ति के अंतर्गत आने वाला हेतु किसी विशेष पक्ष में उपस्थित पाया जाता है, तब साध्य का ज्ञान उत्पन्न होता है।
इसलिए–
व्याप्ति अनुमान की भूमि है; पक्ष में हेतु की उपस्थिति उसका वर्तमान आधार है; परामर्श इन दोनों को जोड़ता है और अनुमिति उसका फल है।
मूल सामग्री भी स्पष्ट रूप से कहती है कि व्याप्ति और अनुमान को एक नहीं समझना चाहिए।
8. अनुमान के प्रमुख प्रकार
न्याय परम्परा में अनुमान का वर्गीकरण एक ही आधार पर नहीं किया गया है। इसलिए “अनुमान के प्रकार” समझते समय वर्गीकरण के आधार को स्पष्ट रखना आवश्यक है।
8.1 स्वार्थानुमान और परार्थानुमान
(क) स्वार्थानुमान
जब व्यक्ति स्वयं अपने लिए अनुमान करता है, तो वह स्वार्थानुमान है।
उदाहरण–
आप पर्वत पर धुआँ देखते हैं और स्वयं निष्कर्ष निकालते हैं–
“पर्वत पर अग्नि है।“
यह अपने ज्ञान की पूर्ति के लिए किया गया अनुमान है।
(ख) परार्थानुमान
जब किसी दूसरे व्यक्ति को किसी निष्कर्ष का बोध कराने के लिए अनुमान व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत किया जाता है, तो वह परार्थानुमान है।
पंचावयवी अनुमान इसका व्यवस्थित रूप है।
मूल पाठ में भी स्वार्थानुमान और परार्थानुमान को अनुमान के प्रमुख वर्गों के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
9. पूर्ववत्, शेषवत् और सामान्यतोदृष्ट
न्याय परम्परा में अनुमान का एक अन्य वर्गीकरण व्याप्ति के स्वरूप और ज्ञान की दिशा से संबंधित है।
(क) पूर्ववत् अनुमान
ज्ञात कारण के आधार पर उसके कार्य का अनुमान करना।
उदाहरण–
घने बादल, विशेष परिस्थितियों आदि को देखकर वर्षा की सम्भावना का अनुमान।
यहाँ ज्ञात कारण से उसके अपेक्षित कार्य की ओर ज्ञान बढ़ता है।
(ख) शेषवत् अनुमान
ज्ञात कार्य या परिणाम से उसके कारण का अनुमान करना।
उदाहरण–
नदी में अचानक अत्यधिक जल देखकर ऊपर किसी क्षेत्र में भारी वर्षा हुई होने का अनुमान।
यहाँ परिणाम से कारण की ओर बढ़ा जाता है।
(ग) सामान्यतोदृष्ट अनुमान
जहाँ अनुमान किसी विशिष्ट कारण-कार्य संबंध पर नहीं बल्कि सामान्य सहचर्य के आधार पर किया जाता है।
इसमें किसी वस्तु या धर्म के सामान्य संबंध से अप्रत्यक्ष तथ्य का ज्ञान प्राप्त होता है।
महत्त्वपूर्ण बात: इन तीनों का आधार स्वार्थ–परार्थ वर्गीकरण से अलग है। इसलिए इन्हें एक ही क्रम में रखकर “अनुमान के तीन ही प्रकार” कहना उचित नहीं होगा; ये विभिन्न वर्गीकरण-आधार हैं।
10. केवलान्वयी, केवलव्यतिरेकी और अन्वयव्यतिरेकी
व्याप्ति के स्वरूप से जुड़े अनुमान-विभाजन में तीन नाम विशेष रूप से आते हैं–
1. केवलान्वयी
जहाँ व्याप्ति की स्थापना मुख्यतः अन्वय के आधार पर होती है।
अर्थात्–
जहाँ हेतु है, वहाँ साध्य है।
2. केवलव्यतिरेकी
जहाँ संबंध की स्थापना मुख्यतः व्यतिरेक के आधार पर की जाती है।
अर्थात्–
जहाँ साध्य नहीं है, वहाँ हेतु भी नहीं है।
3. अन्वयव्यतिरेकी
जहाँ व्याप्ति को दोनों प्रकार से समझा जाता है–
अन्वय: हेतु है → साध्य है।
व्यतिरेक: साध्य नहीं → हेतु नहीं।
यह वर्गीकरण पिछले व्याप्ति-अध्याय से सीधे जुड़ता है; इसलिए इसे यहाँ अनुमान की संरचना समझाने के लिए रखा जा सकता है जबकि व्याप्ति-ग्रहण का विस्तृत विवेचन वहीं रहेगा।
11. अनुमान और प्रत्यक्ष में अंतर
अनुमान को प्रमाण के रूप में समझने के लिए उसका प्रत्यक्ष से अंतर स्पष्ट होना चाहिए।
| आधार | प्रत्यक्ष | अनुमान |
| ज्ञान का आधार | इन्द्रिय/प्रत्यक्ष सन्निकर्ष | हेतु और व्याप्ति |
| वस्तु | प्रत्यक्ष उपस्थित | अप्रत्यक्ष भी हो सकती है |
| प्रक्रिया | प्रत्यक्ष ग्रहण | व्याप्ति-आधारित निष्कर्ष |
| उदाहरण | सामने अग्नि देखना | धुआँ देखकर अग्नि जानना |
प्रत्यक्ष में अग्नि स्वयं दिखाई देती है; अनुमान में अग्नि धुएँ के माध्यम से जानी जाती है।
इसलिए अनुमान प्रत्यक्ष का विरोधी नहीं बल्कि प्रत्यक्ष की सीमा का दार्शनिक विस्तार है।
12. क्या हर अनुमान प्रमाण होता है?
यह प्रश्न अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
केवल किसी बात से दूसरी बात का अनुमान लगा लेना न्याय के अर्थ में प्रमाण नहीं है। प्रमाणात्मक अनुमान के लिए आवश्यक है कि–
- पक्ष में हेतु का होना ज्ञात हो।
- हेतु और साध्य के बीच व्याप्ति स्थापित हो।
- वह व्याप्ति वर्तमान पक्ष पर लागू हो।
- उससे साध्य का यथार्थ ज्ञान उत्पन्न हो।
अर्थात् अनुमान की प्रमाणिकता केवल निष्कर्ष निकालने में नहीं बल्कि निष्कर्ष तक पहुँचने वाली ज्ञान-व्यवस्था की वैधता में है।
इसीलिए न्याय में व्याप्ति को अनुमान की आधारभूत शर्त माना जाता है।
13. चार्वाक की चुनौती और अनुमान का प्रमाणत्व
भारतीय दर्शन में अनुमान के प्रमाणत्व पर महत्त्वपूर्ण प्रश्न चार्वाक दर्शन की ओर से उठता है।
चार्वाक प्रत्यक्ष को प्रमुख प्रमाण मानता है और अनुमान की सार्वभौमिक निश्चितता पर प्रश्न उठाता है। समस्या यह है कि सीमित अनुभवों से सार्वभौमिक व्याप्ति को किस प्रकार निश्चित माना जाए?
उदाहरण के लिए–
हमने अनेक स्थानों पर धुएँ के साथ आग देखी। लेकिन क्या इससे यह पूर्णतः सिद्ध हो जाता है कि हर संभव परिस्थिति में जहाँ धुआँ होगा वहाँ आग अवश्य होगी?
न्याय का उत्तर यह है कि अनुमान को केवल कुछ घटनाओं के सह-अस्तित्व पर आधारित नहीं किया जाता। व्याप्ति की स्थापना, उसके परीक्षण और पक्ष में उसकी उपस्थिति के विशिष्ट संबंध के आधार पर अनुमान प्रमाणात्मक बनता है।
इस प्रकार चार्वाक की आपत्ति अनुमान की प्रमाणिकता को अधिक कठोर बनाने वाली दार्शनिक चुनौती के रूप में भी समझी जा सकती है।
14. दैनिक जीवन में अनुमान
अनुमान केवल शास्त्रीय उदाहरणों तक सीमित नहीं है।
उदाहरण 1: सड़क गीली है
हम देखते हैं कि सड़क गीली है और अनुमान लगाते हैं कि वर्षा हुई होगी।
लेकिन यहाँ सावधानी आवश्यक है।
गीली सड़क → वर्षा का संबंध धुआँ → अग्नि जैसा अनिवार्य नहीं है, क्योंकि सड़क पानी से धोई भी जा सकती है।
इसलिए प्रत्येक दैनिक “अनुमान” न्याय-दर्शन के कठोर अर्थ में प्रमाणात्मक अनुमान नहीं माना जा सकता।
उदाहरण 2: घर में धुआँ
यदि किसी बंद कमरे से धुआँ निकल रहा है और धूम-अग्नि की स्थापित व्याप्ति लागू होती है, तो भीतर अग्नि होने का अनुमान किया जा सकता है।
यह उदाहरण न्याय की अनुमान-पद्धति को अधिक स्पष्ट करता है।
15. अनुमान प्रमाण क्यों है?
अब अध्याय के मूल प्रश्न का उत्तर स्पष्ट किया जा सकता है।
अनुमान प्रमाण इसलिए है क्योंकि वह स्थापित व्याप्ति और पक्ष में उपस्थित हेतु के आधार पर उस साध्य का यथार्थ ज्ञान उत्पन्न करता है जो प्रत्यक्ष रूप से उपलब्ध नहीं है।
अनुमान हमें–
- दूरस्थ वस्तुओं का ज्ञान देता है,
- अप्रत्यक्ष तथ्यों का ज्ञान देता है,
- प्रत्यक्ष से छिपे संबंधों को समझने में सहायता करता है,
- वर्तमान संकेत से अप्रत्यक्ष साध्य तक पहुँचाता है,
- और इस प्रकार मानव ज्ञान की सीमा का विस्तार करता है।
मूल पाठ भी अनुमान को प्रत्यक्ष से आगे बढ़कर दूरस्थ, अप्रत्यक्ष और अन्यथा अज्ञात तथ्यों के ज्ञान का साधन मानता है।
इस अर्थ में न्याय का अनुमान केवल “निष्कर्ष निकालने की कला” नहीं बल्कि ज्ञान की वैधता का एक सुव्यवस्थित सिद्धांत है।
16. अनुमान की सम्पूर्ण प्रक्रिया: एक दृष्टि में
पर्वत–धुआँ–अग्नि के उदाहरण को सम्पूर्ण प्रक्रिया में रखें–
पर्वत का प्रत्यक्ष ज्ञान
↓
पर्वत पर धुआँ दिखाई दिया
↓
धूम–अग्नि की व्याप्ति का स्मरण
↓
पर्वत के धुएँ को व्याप्ति से जोड़ा गया
↓
परामर्श उत्पन्न हुआ
↓
पर्वत पर अग्नि की अनुमिति हुई
इसे सूत्र में–
पक्ष में हेतु → व्याप्ति-ज्ञान → परामर्श → अनुमिति
और पंचावयवी प्रस्तुति में–
प्रतिज्ञा → हेतु → उदाहरण → उपनय → निगमन
17. व्याप्ति और अनुमान: दोनों अध्यायों का संबंध
इन दोनों अध्यायों को एक-दूसरे से अलग करके पढ़ना आवश्यक है लेकिन उनके संबंध को भूलना नहीं चाहिए।
व्याप्ति अध्याय का मुख्य प्रश्न है–
हेतु और साध्य के बीच निश्चित संबंध क्या है और उसकी स्थापना कैसे होती है?
अनुमान अध्याय का मुख्य प्रश्न है–
उस स्थापित व्याप्ति के आधार पर किसी पक्ष में साध्य का ज्ञान कैसे उत्पन्न होता है?
इसलिए–
व्याप्ति बताती है कि संबंध क्या है; अनुमान बताता है कि उस संबंध से अप्रत्यक्ष ज्ञान कैसे उत्पन्न होता है।
और आगे–
हेत्वाभास का अध्याय यह बताएगा कि अनुमान में प्रयुक्त हेतु कब दोषपूर्ण हो जाता है।
इस प्रकार तीनों अध्यायों का क्रम स्वाभाविक बनता है–
व्याप्ति → अनुमान → हेत्वाभास
18. दार्शनिक सार
न्याय दर्शन में अनुमान वह प्रमाण है जिसके द्वारा पक्ष में प्रत्यक्ष रूप से ज्ञात हेतु, उसके साथ स्थापित व्याप्ति और उससे उत्पन्न परामर्श के आधार पर अप्रत्यक्ष साध्य का यथार्थज्ञान प्राप्त होता है।
पर्वत पर धुआँ दिखाई देना स्वयं अग्नि का ज्ञान नहीं है। धूम–अग्नि की व्याप्ति का ज्ञान भी अकेले पर्वत की अग्नि का ज्ञान नहीं है। जब पर्वत में उपस्थित धुएँ को अग्नि-व्याप्त धुएँ के रूप में जाना जाता है, तब परामर्श के माध्यम से अग्नि की अनुमिति उत्पन्न होती है।
यही न्याय के अनुमान सिद्धांत की दार्शनिक सूक्ष्मता है।
स्मरण-सूत्र
पक्ष में हेतु → व्याप्ति → परामर्श → अनुमिति
और पंचावयव के लिए–
प्रतिज्ञा → हेतु → उदाहरण → उपनय → निगमन
एक पंक्ति में
“व्याप्ति अनुमान की आधारभूमि है, परामर्श उसकी निर्णायक कड़ी है और अनुमिति उसका ज्ञानफल है।“
परीक्षा के लिए 5 पंक्तियों का उत्तर
न्याय दर्शन में अनुमान वह प्रमाण है जिसके द्वारा ज्ञात हेतु और साध्य के बीच स्थापित व्याप्ति के आधार पर अप्रत्यक्ष साध्य का यथार्थज्ञान प्राप्त होता है। इसमें पक्ष, साध्य, हेतु और व्याप्ति प्रमुख हैं। परामर्श पक्ष में उपस्थित हेतु को व्याप्ति से सम्बद्ध करता है और उससे अनुमिति उत्पन्न होती है। परार्थानुमान को न्याय में प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय और निगमन–इन पाँच अवयवों में प्रस्तुत किया जाता है। अतः अनुमान प्रत्यक्ष से परे यथार्थ ज्ञान प्राप्त करने का महत्त्वपूर्ण प्रमाण है।
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अनुमिति | अनुमान का सिद्धांत
मानस जिले सिंह
【यथार्थवादी विचारक 】
अनुयायी – मानस पंथ, शिष्य – प्रोफेसर औतार लाल मीणा
उद्देश्य – मानवीय मूल्यों की स्थापना हेतु प्रकृति के नियमों का यथार्थ प्रस्तुतीकरण में संकल्पबद्ध योगदान देना।

