स्वयं से प्रेम | अद्वैत की अनुभूति
Love To Myself | A Prayer to Myself | Man Ke Bhav | Snvany se Sanvad | Ek Virah Ka Bhav
|| Love To Myself ||
प्रेम: अद्वैत की अनुभूति
तो अब कैसे कहूँ कि मुझे आपसे प्रेम है?
पहले कहा करता था—
प्यार किया नहीं जाता, हो जाता है;
प्यार देखा नहीं जाता,
सिर्फ़ महसूस किया जाता है।
अद्वैत को समझने के बाद लगता है—
शायद प्रेम भी किसी दूसरे से नहीं होता;
प्रेम तो उस क्षण घटित होता है
जब ‘मैं’ और ‘तुम’ के बीच का भेद
धीरे-धीरे विलीन होने लगता है।
प्रेम कोई लक्ष्य नहीं,
जिसे साधना से प्राप्त किया जाए;
न ही कोई ऐसी वस्तु है
जिसे पाने, रखने या अपना कहने का आग्रह किया जाए।
प्रेम तो समत्व-भाव की साधना की उस निःशब्द परिणति का नाम है,
जहाँ भीतर का ‘मैं’ इतना शांत हो जाता है
कि अस्तित्व को अलग-अलग देखना ही समाप्त होने लगता है।
तब आप आप नहीं रहते
और मैं मैं नहीं रहता—
जो शेष रहता है,
वही प्रेम है।
प्रेम अंतर्मन की कोई निर्मित भावना नहीं,
बल्कि अंतर्मन से स्वतः प्रकट होने वाली वह अनुभूति है
जिसमें प्रकृति, अस्तित्व और स्वयं के बीच
कोई विभाजन शेष नहीं रहता।
उसे जाना नहीं जा सकता,
क्योंकि जानने वाला और जिसे जाना जाए—
दोनों का भेद ही वहाँ मिटने लगता है।
उसे केवल अभिभूत होकर
जिया जा सकता है।
और शायद इसी कारण
प्रेम में अधिकार का कोई स्थान नहीं।
जिस क्षण हम किसी को बाँधना चाहते हैं,
उसी क्षण प्रेम की सहजता समाप्त होने लगती है।
जो प्रेम था,
वह धीरे-धीरे मोहपाश बन जाता है—
पहले डोरी की तरह बाँधता है,
फिर बंधन बनकर जकड़ता है;
और अंततः मनुष्य को इतना अपने भीतर कैद कर देता है
कि वह सत्य को देखना,
स्वतंत्र होकर सुनना
और अपने ही अंतर्मन की आवाज़ पहचानना भूल जाता है।
इसलिए प्रेम किसी को अपना बनाने का नाम नहीं;
प्रेम तो अपनेपन की सीमा मिट जाने का नाम है।
प्रेम में स्वतंत्रता इसलिए नहीं कि
हम एक-दूसरे से मुक्त हैं,
बल्कि इसलिए कि
हम एक-दूसरे को बाँधने की आवश्यकता से मुक्त हैं।
जहाँ ‘मैं’ और ‘तुम’ का आग्रह क्षीण होता है,
वहीं प्रेम प्रकट होता है।
जहाँ स्वामित्व समाप्त होता है,
वहीं समर्पण जन्म लेता है।
और जहाँ समर्पण भी किसी कर्ता का कर्म नहीं रह जाता,
वहीं अद्वैत की वह निःशब्द अनुभूति घटती है—
जिसे शब्द ‘प्रेम’ कहते हैं।
अतः प्रेम स्वतंत्रता भी है,
समर्पण भी;
विरह भी है, मिलन भी—
और अंततः न विरह बचता है, न मिलन;
केवल वह एकत्व शेष रहता है
जिसमें प्रेम करने वाला,
प्रेम पाने वाला
और स्वयं प्रेम—
तीनों एक हो जाते हैं।
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स्वयं से प्रेम | अद्वैत की अनुभूति
मानस जिले सिंह
【यथार्थवादी विचारक 】
अनुयायी – मानस पंथ, शिष्य – प्रोफेसर औतार लाल मीणा
उद्देश्य – मानवीय मूल्यों की स्थापना हेतु प्रकृति के नियमों का यथार्थ प्रस्तुतीकरण में संकल्पबद्ध योगदान देना।
www.sakshiyoga.orgस्तुतीकरण में संकल्पबद्ध योगदान देना।

