A Prayer To Myself | स्वयं से संवाद

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स्वयं से संवाद | अद्वैत में रहने की चाह
A Prayer to Myself | Man Ke Bhav | Snvany se Sanvad | Ek Virah Ka Bhav

|| Man Ke Bhav ||

जानना नहीं, अब जागना होगा

जानना नहीं,
अब जागना होगा।

जानकर
आप समझदार तो बन सकते हैं,
पर जागृत नहीं।

सवेरा
आपको जगा तो सकता है,
पर चेतना में
नवज्ञान के अंकुर
प्रस्फुटित नहीं कर सकता।

अब जागना भी नहीं—
जीना होगा।

क्योंकि नवजागरण
आपको जीवंत तो बना सकता है,
पर वहाँ भी
ज्ञाता, ज्ञेय और ज्ञान
अलग-अलग रह ही जाते हैं।

यह वह यात्रा है
जहाँ ज्ञान
केवल जानने का विषय नहीं,
स्वयं होने की प्रक्रिया बन जाता है।

यह ऐसी यात्रा है
जहाँ एक दिन
ज्ञाता नहीं रहता,
ज्ञेय नहीं रहता,
ज्ञान भी अलग नहीं रहता—
तीनों का भेद
स्वयं में विलीन हो जाता है।

और तब
इस भवसागर की यात्रा के लिए
समझदार होना आवश्यक नहीं।

कभी-कभी
नासमझ होना ही पर्याप्त है—
क्योंकि समझ
जहाँ तक ले जा सकती है,
वहाँ से आगे
प्रेमपूर्वक क्षमा,
समर्पण , अंतर्मुखी मौन और समत्व
ही मार्ग बनते हैं।

इसलिए क्यों न कहूँ—

समझदार नहीं,
नासमझ हूँ;
इसीलिए आज
गुरुवर के चरणों की
रज हूँ।

तभी तो
प्रकृति का प्रत्येक ज्ञानवान प्राणी
मेरा गुरु है,
मेरा प्रेरणास्रोत है।

अद्वैत में एकाकार होकर
कभी शंकर बनूँ,
कभी राम;
कभी दुर्गा बनूँ,
तो कभी
कृष्ण के अधरों पर सजी
बाँसुरी की तान।

पर आनंद तो तब है
जब मैं कुछ भी कहलाने की
आकांक्षा छोड़कर
केवल इतना बन जाऊँ—

गुरुवर के चरणों की धूल।

चरणों से चिपकी रही
तो प्रतिदिन सँवारी जाऊँगी;
और यदि कभी
उनसे छिटक भी गई,
तो निःस्वार्थ, निर्मल और निश्छल जीवों के स्पर्श से
फिर सँवारी जाऊँगी।

क्योंकि धूल का सौभाग्य
उसके कण होने में नहीं,
किसी पवित्र चरण से
जुड़े रहने में है।

और शायद
यही मेरी अंतिम साधना होगी—

न ज्ञाता रहूँ,
न ज्ञेय;
न ज्ञान का अहंकार रहे,
न अपने होने का दावा।

बस इतनी कृपा हो
कि एक दिन
गुरुचरणों की रज बनकर
उसी में विलीन हो जाऊँ—

जहाँ रज होने का भी दंभ न रहे,
चरणों से जुड़ने की आसक्ति भी न रहे,
न समर्पण का अहंकार रहे,
न स्वयं के मिटने का बोध।

और अंततः—

न रज रहे,
न चरण रहें,
न मैं रहूँ,
न मेरा समर्पण;
न कोई दूसरा रहे,
न किसी दूसरे से मिलने की आकांक्षा।

जहाँ ‘मैं’ और ‘ब्रह्म’ के बीच
लेशमात्र भी भेद न बचे;
जहाँ जानने वाला भी न रहे,
जानने योग्य भी न रहे,
और ज्ञान भी किसी वस्तु का ज्ञान न रहे।

वहीं मौन में
महावाक्य उद्घाटित हो—

“अहं ब्रह्मास्मि।”

न इसे कहने वाला कोई ‘मैं’,
न इसे जानने का कोई दावा;
क्योंकि वहाँ
‘मैं ब्रह्म हूँ’ कहना भी शेष नहीं—
केवल ब्रह्म ही है।

न रज, न चरण,
न गुरु, न शिष्य,
न साधना, न साधक—
केवल अद्वैत सत्य।

यही वह बोध है
जहाँ एकाकार होना भी समाप्त हो जाता है,
क्योंकि जब दूसरा है ही नहीं,
तो एकाकार होने का प्रश्न भी कहाँ?

“नेति, नेति” से
जिसे खोजते-खोजते
सब आवरण गिर जाएँ,
वहीं अंततः
स्वयं में स्वयं का प्रकाश रह जाए—
शांत, पूर्ण, अद्वैत।

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मानस जिले सिंह
【यथार्थवादी विचारक 】
अनुयायी – मानस पंथ, शिष्य – प्रोफेसर औतार लाल मीणा
उद्देश्य – मानवीय मूल्यों की स्थापना हेतु प्रकृति के नियमों का यथार्थ प्रस्तुतीकरण में संकल्पबद्ध योगदान देना।

www.sakshiyoga.org

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