Theory of Invariable Concomitance | व्याप्ति का सिद्धांत

More articles

नियत सहचर्य का नियम | व्याप्ति का सिद्धांत
Theory of Invariable Concomitance | Invariable Concomitance | Vyapti Ka Siddhant

|| Theory of Invariable Concomitance ||

व्याप्ति का सिद्धांत

न्याय दर्शन में अनिवार्य सहचर्य, व्याप्ति-ग्रहण, अन्वय–व्यतिरेक और अनुमान का दार्शनिक आधार

अध्याय का केंद्रीय प्रश्न:
“““जब किसी वस्तु या धर्म का प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं है, तब उसके बारे में निश्चित ज्ञान कैसे संभव है?“

न्याय दर्शन में अनुमान इसी प्रश्न का उत्तर देता है। परंतु अनुमान की विश्वसनीयता केवल इस बात पर निर्भर नहीं करती कि हमने किसी घटना को कई बार साथ-साथ देखा है। अनुमान के पीछे एक अधिक मूलभूत ज्ञान आवश्यक है–व्याप्ति का ज्ञान। जहाँ हेतु है, वहाँ साध्य का होना और जहाँ साध्य नहीं है, वहाँ हेतु का भी न होना–जब यह संबंध निश्चित, अविच्छिन्न और अनिवार्य रूप से जाना जाता है तभी अनुमान विश्वसनीय बनता है। प्रस्तुत मूल सामग्री में व्याप्ति को इसी अर्थ में अनुमान की आधारभूत शर्त माना गया है।

1. अनुमान की समस्या और व्याप्ति की आवश्यकता

मनुष्य के ज्ञान का एक बड़ा भाग ऐसी वस्तुओं के संबंध में होता है जो उस क्षण प्रत्यक्ष नहीं होतीं।

मान लीजिए, हम दूर एक पर्वत को देखते हैं। पर्वत पर धुआँ दिखाई दे रहा है लेकिन अग्नि दिखाई नहीं दे रही। फिर भी हम कहते हैं–

“पर्वतो वह्निमान्।”
अर्थात्–पर्वत अग्निमान् है।

प्रश्न उठता है–आग दिखाई नहीं दे रही फिर आग का ज्ञान कैसे हुआ?

केवल धुएँ को देख लेने से आग का ज्ञान नहीं हो जाता। इसके पीछे पहले से ज्ञात एक निश्चित संबंध काम करता है–

जहाँ-जहाँ धुआँ है, वहाँ-वहाँ अग्नि है।

यही व्याप्ति है।

इसलिए अनुमान की ज्ञान-प्रक्रिया को सरल रूप में इस प्रकार समझा जा सकता है–

पक्ष में हेतु का ज्ञान → व्याप्ति का ज्ञान → परामर्श → साध्य का अनुमान

मूल सामग्री भी व्याप्तिज्ञान, परामर्श और अनुमान के इसी क्रम को रेखांकित करती है।

2. व्याप्ति का अर्थ

2.1 सरल अर्थ

व्याप्ति वह निश्चित और अविच्छिन्न संबंध है जिसमें एक धर्म या हेतु जहाँ-जहाँ विद्यमान होता है, वहाँ दूसरा धर्म अर्थात् साध्य भी अनिवार्य रूप से विद्यमान होता है।

सरल सूत्र–

“हेतु जहाँ-जहाँ, साध्य वहाँ-वहाँ।“

उदाहरण–

जहाँ धुआँ है, वहाँ अग्नि है।

यहाँ–

  • पक्ष – पर्वत
  • हेतु – धूम
  • साध्य – अग्नि
  • व्याप्ति – धूम और अग्नि का निश्चित सहचर्य

मूल पाठ में भी धूम–अग्नि के संबंध को व्याप्ति का प्रमुख उदाहरण बनाया गया है।

2.2 व्याप्य और व्यापक

व्याप्ति को ठीक से समझने के लिए दो शब्दों को समझना आवश्यक है–

व्याप्य

जो दूसरे से व्याप्त होता है।

व्यापक

जो दूसरे को व्याप्त करता है।

धूम–अग्नि के उदाहरण में–

धूम व्याप्य है और अग्नि व्यापक है।

अर्थात् जहाँ धूम है, वहाँ अग्नि आवश्यक रूप से है लेकिन केवल “जहाँ अग्नि है वहाँ धूम है” कहना उसी अर्थ में सार्वत्रिक रूप से सही नहीं होगा क्योंकि अग्नि के ऐसे अनेक रूप हो सकते हैं जिनमें धुआँ न हो।

उदाहरण–

जलती हुई गैस की लौ में अग्नि है लेकिन आवश्यक नहीं कि वहाँ धुआँ भी हो।

इससे स्पष्ट होता है कि व्याप्ति में संबंध की दिशा अत्यंत महत्वपूर्ण है।

3. व्याप्ति केवल सह-अस्तित्व नहीं है

यह व्याप्ति की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक है।

दो वस्तुएँ कई बार एक साथ दिखाई दें, इससे उनके बीच व्याप्ति सिद्ध नहीं होती।

उदाहरण–

“जहाँ-जहाँ मोर है, वहाँ-वहाँ वर्षा होती है।”

हमने अनेक अवसरों पर वर्षा के समय मोर देखे। इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि मोर की उपस्थिति वर्षा के लिए अनिवार्य है।

मोर और वर्षा का संबंध कुछ परिस्थितियों में दिखाई दे सकता है, लेकिन उसमें न्याय की कठोर अर्थवाली निश्चितता और अनिवार्यता आवश्यक रूप से सिद्ध नहीं होती। मूल पाठ इसी अंतर को “मोर–वर्षा” के उदाहरण से स्पष्ट करता है।

अतः–

सह-अस्तित्व ≠ व्याप्ति

और–

सहसंबंध ≠ अनिवार्य व्याप्ति

व्याप्ति में केवल यह नहीं पूछा जाता–

“क्या दोनों साथ दिखाई देते हैं?“

बल्कि पूछा जाता है–

“क्या एक की उपस्थिति दूसरे की उपस्थिति से अनिवार्य रूप से जुड़ी है?“

4. व्याप्ति के मूल स्वरूप: अन्वय और व्यतिरेक

व्याप्ति को स्थापित करने में न्याय परंपरा में अन्वय और व्यतिरेक का विशेष महत्त्व है। मूल सामग्री में भी इन्हें व्याप्ति के परीक्षण के प्रमुख आधारों के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

4.1 अन्वय

अन्वय का अर्थ है–सकारात्मक सहस्थिति।

अर्थात्–

जहाँ हेतु है, वहाँ साध्य है।

धूम–अग्नि उदाहरण–

जहाँ धुआँ है → वहाँ अग्नि है।

उदाहरण–

  • रसोई में धुआँ है → वहाँ अग्नि है।
  • चूल्हे में धुआँ है → वहाँ अग्नि है।
  • जलती लकड़ी में धुआँ है → वहाँ अग्नि है।

यहाँ धूम की उपस्थिति के साथ अग्नि की उपस्थिति देखी जाती है।

स्मरण-सूत्र:

अन्वय = है → है

5. व्यतिरेक

व्यतिरेक का अर्थ है–नकारात्मक सह-अभाव।

अर्थात्–

जहाँ साध्य नहीं है, वहाँ हेतु भी नहीं है।

धूम–अग्नि में–

जहाँ अग्नि नहीं है → वहाँ धुआँ नहीं है।

उदाहरण–

  • जलाशय में अग्नि नहीं → धुआँ नहीं।
  • खुले स्वच्छ जल में अग्नि नहीं → धुआँ नहीं।

इस प्रकार–

साध्य का अभाव → हेतु का अभाव

मूल सामग्री में अग्नि के अभाव में धूम के अभाव को इसी प्रकार व्यतिरेक के रूप में समझाया गया है।

स्मरण-सूत्र:

व्यतिरेक = नहीं → नहीं

6. अन्वय–व्यतिरेक द्वारा व्याप्ति

जब किसी संबंध की स्थापना सकारात्मक और नकारात्मक–दोनों पक्षों से की जाती है, तब व्याप्ति का ज्ञान अधिक सुदृढ़ होता है।

धूम–अग्नि में–

अन्वय

धूम है → अग्नि है।

व्यतिरेक

अग्नि नहीं → धूम नहीं।

इस प्रकार–

धूम की उपस्थिति के साथ अग्नि की उपस्थिति तथा अग्नि के अभाव में धूम का अभाव–दोनों मिलकर संबंध की निश्चितता को पुष्ट करते हैं।

एक दृष्टि में

पक्षरूपउदाहरण
अन्वयहेतु है → साध्य हैधुआँ है → आग है
व्यतिरेकसाध्य नहीं → हेतु नहींआग नहीं → धुआँ नहीं
अन्वय–व्यतिरेकदोनों का संयुक्त परीक्षणधुआँ–आग

7. केवलान्वयी, केवलव्यतिरेकी और अन्वयव्यतिरेकी

यहाँ एक आवश्यक दार्शनिक भेद समझना चाहिए।

अन्वय और व्यतिरेक व्याप्ति को समझने के ढंग हैं जबकि केवलान्वयी, केवलव्यतिरेकी और अन्वयव्यतिरेकी न्याय में अनुमान के प्रसिद्ध प्रकारों का वर्गीकरण हैं। इसलिए इन्हें सीधे “व्याप्ति के तीन पदार्थ” कहना उचित नहीं होगा। लेकिन व्याप्ति की अन्वयात्मक और व्यतिरेकात्मक संरचना को समझने के लिए इनका अध्ययन आवश्यक है।

7.1 केवलान्वयी

जहाँ साध्य के अभाव का कोई उपयुक्त उदाहरण उपलब्ध न होने के कारण व्यतिरेक द्वारा परीक्षण संभव नहीं होता और सकारात्मक सहचर्य के आधार पर अनुमान की संरचना समझी जाती है।

7.2 केवलव्यतिरेकी

जहाँ व्यतिरेक के आधार पर संबंध स्थापित किया जाता है और अन्वय का स्वतंत्र उदाहरण उपलब्ध नहीं होता।

7.3 अन्वयव्यतिरेकी

जहाँ दोनों प्रकार के उदाहरण उपलब्ध होते हैं–

अन्वय भी और व्यतिरेक भी।

धूम–अग्नि का उदाहरण इसी प्रकार की व्याख्या के लिए सबसे सहज है।

स्मरण-सूत्र

केवलान्वयी → अन्वय प्रधान
केवलव्यतिरेकी → व्यतिरेक प्रधान
अन्वयव्यतिरेकी → दोनों

8. व्याप्ति और अनुमान का संबंध

व्याप्ति को समझने के बाद अनुमान की पूरी प्रक्रिया स्पष्ट हो जाती है।

मान लीजिए–

पर्वत पर धुआँ है।

यह प्रत्यक्ष ज्ञान है।

फिर हमें पहले से ज्ञात है–

जहाँ धुआँ है, वहाँ अग्नि है।

यह व्याप्तिज्ञान है।

अब हम दोनों को जोड़ते हैं–

पर्वत में ऐसा धुआँ है जो अग्नि से व्याप्त है।

यह परामर्श है।

इसके बाद–

अतः पर्वत पर अग्नि है।

यह अनुमिति/अनुमानजन्य ज्ञान है।

मूल फाइल में इसी प्रक्रिया को प्रत्यक्ष → व्याप्ति-स्मरण → परामर्श → अनुमान के रूप में समझाया गया है।

9. व्याप्ति और अनुमान में अंतर

इन दोनों को एक समझ लेना विद्यार्थियों की सामान्य भूल है।

व्याप्तिअनुमान
हेतु और साध्य के अनिवार्य संबंध का ज्ञानउस संबंध के आधार पर किसी विशेष पक्ष में साध्य का ज्ञान
सार्वत्रिक संबंध से संबंधितविशेष परिस्थिति से संबंधित
“जहाँ धूम, वहाँ अग्नि”“पर्वत पर अग्नि है”
अनुमान की आधारभूमिव्याप्ति पर आधारित निष्कर्ष

अतः–

धुआँ देखकर आग का ज्ञान = अनुमान
धुआँ और आग के अनिवार्य संबंध का ज्ञान = व्याप्तिज्ञान।

यह भेद मूल सामग्री की केंद्रीय संरचना से भी स्पष्ट होता है।

10. व्याप्ति, हेतु और पक्षधर्मता

अनुमान में तीन बातें अलग-अलग हैं–

पक्ष

जिसके विषय में निष्कर्ष निकालना है।

उदाहरण: पर्वत।

हेतु

जिसके आधार पर निष्कर्ष निकाला जा रहा है।

उदाहरण: धुआँ।

साध्य

जिसे सिद्ध करना है।

उदाहरण: अग्नि।

व्याप्ति

हेतु और साध्य का निश्चित संबंध।

पर्वत = पक्ष
धुआँ = हेतु
अग्नि = साध्य
धूम–अग्नि का अनिवार्य संबंध = व्याप्ति

इसलिए केवल पर्वत पर धुआँ देखना पर्याप्त नहीं। हमें यह भी ज्ञात होना चाहिए कि धूम अग्नि से व्याप्त है।

11. व्याप्ति-ग्रहण की मूल दार्शनिक समस्या

अब व्याप्ति का सबसे गहरा प्रश्न सामने आता है–

हम व्याप्ति को जानते कैसे हैं?

हमने जितने भी धुएँ और आग के उदाहरण देखे हैं, वे सीमित हैं।

हमने कुछ स्थानों पर देखा–

धुआँ → आग।

लेकिन क्या इससे यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है–

हर संभव स्थान, हर समय और हर परिस्थिति में जहाँ धुआँ होगा, वहाँ अग्नि होगी?

यही व्याप्ति-ग्रहण की दार्शनिक समस्या है।

सीमित अनुभव से सार्वत्रिक संबंध का ज्ञान कैसे प्राप्त हो?

यह प्रश्न केवल न्याय दर्शन की तकनीकी समस्या नहीं है; यह मानव ज्ञान की सार्वत्रिकता से जुड़ा प्रश्न है।

12. क्या बार-बार देखने से व्याप्ति सिद्ध हो जाती है?

मान लें हमने सौ स्थानों पर देखा–

  • रसोई में धुआँ → आग
  • चूल्हे में धुआँ → आग
  • लकड़ी जलने पर धुआँ → आग
  • जंगल में धुआँ → आग

क्या सौ उदाहरणों से व्याप्ति पूर्णतः सिद्ध हो जाएगी?

दार्शनिक दृष्टि से समस्या बनी रहती है–

क्या अगला उदाहरण भी वैसा ही होगा?

इसलिए व्याप्ति को केवल बार-बार देखे गए सह-अस्तित्व से समान नहीं किया जा सकता।

मूल सामग्री भी स्पष्ट करती है कि केवल कई बार साथ दिखाई देना पर्याप्त नहीं; व्याप्ति के लिए निश्चितता और अनिवार्यता आवश्यक है।

13. चार्वाक की चुनौती: व्याप्ति का ज्ञान कैसे?

यहीं चार्वाक दर्शन की आपत्ति अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।

चार्वाक प्रत्यक्ष को ज्ञान का प्रमुख/प्रामाणिक आधार मानते हुए यह प्रश्न उठाता है कि–

सार्वत्रिक व्याप्ति का प्रत्यक्ष अनुभव कैसे होगा?

हम किसी विशेष धुएँ और किसी विशेष अग्नि को देख सकते हैं लेकिन “सभी धूमों में अग्नि है” जैसी सार्वत्रिकता को प्रत्यक्ष रूप से नहीं देख सकते।

और यदि कोई कहे कि–

“हमने बहुत बार देखा है, इसलिए व्याप्ति सिद्ध है,”

तो चार्वाक पूछ सकता है–

क्या सीमित उदाहरणों से असीमित सार्वत्रिकता सिद्ध हो सकती है?

और यदि व्याप्ति को अनुमान से सिद्ध करना चाहें, तो दूसरी समस्या उठती है–

अनुमान स्वयं व्याप्ति पर निर्भर है।

तब प्रश्न हो सकता है–

व्याप्ति को अनुमान से सिद्ध करने के लिए अनुमान की व्याप्ति कहाँ से आई?

इस प्रकार व्याप्ति-ग्रहण के प्रश्न में अन्योन्याश्रय/चक्र की आपत्ति का प्रसंग सामने आता है।

14. न्याय का प्रत्युत्तर: व्याप्ति केवल पुनरावृत्ति नहीं

न्याय का उत्तर यह नहीं है कि–

“बस बहुत बार धुआँ और आग साथ देख लो और व्याप्ति सिद्ध हो गई।”

व्याप्ति की स्थापना अधिक सावधानी से की जाती है।

इसमें प्रमुख रूप से विचार किया जाता है–

  1. अन्वय
  2. व्यतिरेक
  3. तर्क
  4. उपाधि की जाँच
  5. जहाँ उपयुक्त हो, संबंध की आवश्यक प्रकृति का परीक्षण

इसलिए व्याप्ति केवल सांख्यिकीय सहसंबंध नहीं है।

15. व्याप्ति और तर्क

तर्क का उद्देश्य किसी प्रतिपक्ष की असंगति को दिखाकर किसी मान्य संबंध को अधिक स्पष्ट करना है।

उदाहरण के लिए यदि कोई कहे–

“धुएँ का अग्नि से कोई निश्चित संबंध नहीं है,”

तो हम विचार कर सकते हैं कि यदि धूम अग्नि से पूर्णतः असंबद्ध हो, तो धूम के आधार पर अग्नि का अनुमान क्यों और कैसे संभव होगा?

यहाँ तर्क व्याप्ति के ज्ञान को सहारा देता है।

लेकिन एक महत्वपूर्ण बात–

तर्क स्वयं स्वतंत्र प्रमाण नहीं है; वह व्याप्ति-ग्रहण में सहायक भूमिका निभाता है।

यह भेद विद्यार्थियों के लिए अत्यंत आवश्यक है।

16. व्याप्ति और उपाधि की समस्या

व्याप्ति के अध्ययन में उपाधि अत्यंत महत्वपूर्ण है।

उपाधि को सरल रूप में ऐसी अतिरिक्त शर्त के रूप में समझ सकते हैं जिसके कारण कोई संबंध पहली दृष्टि में सार्वत्रिक दिखाई देता है लेकिन वास्तव में वह किसी विशेष परिस्थिति पर निर्भर होता है।

इसलिए यदि हम बिना सभी आवश्यक शर्तों की जाँच किए सार्वत्रिक व्याप्ति मान लें, तो अनुमान दोषपूर्ण हो सकता है।

मूल पाठ भी इसी कारण उपाधि को व्याप्ति की स्थापना की महत्वपूर्ण समस्या के रूप में प्रस्तुत करता है।

सरल उदाहरण

मान लीजिए कोई कहे–

“जहाँ बादल हैं, वहाँ वर्षा अवश्य होती है।”

हम जानते हैं कि केवल बादल होना वर्षा की पर्याप्त शर्त नहीं है। अनेक बार बादल आते हैं और वर्षा नहीं होती।

इसलिए केवल बार-बार साथ दिखाई देने वाली घटना को देखकर सार्वत्रिक व्याप्ति घोषित करना उचित नहीं।

17. व्याप्ति और कारणता में अंतर

व्याप्ति और कारणता को भी एक नहीं समझना चाहिए।

व्याप्ति का प्रश्न है–

क्या हेतु और साध्य के बीच ऐसा अनिवार्य संबंध है कि हेतु की उपस्थिति साध्य की उपस्थिति से जुड़ी हो?

कारणता का प्रश्न है–

क्या एक घटना दूसरी घटना को उत्पन्न करती है?

दोनों में संबंध हो सकता है, लेकिन दोनों संकल्पनाएँ समान नहीं हैं।

उदाहरण के लिए–

धूम–अग्नि का संबंध अनेक प्रसंगों में कारणात्मक संदर्भ रख सकता है,

लेकिन न्याय की व्याप्ति की तार्किक भूमिका केवल “कारण होने” तक सीमित नहीं की जानी चाहिए।

इसलिए–

व्याप्ति = अनिवार्य सहचर्य
कारणता = उत्पत्ति/उत्पादक संबंध

18. व्याप्ति और केवल सहसंबंध

आधुनिक जीवन से उदाहरण लें।

मान लें किसी शहर में जब-जब गर्मी बढ़ती है, तब-तब आइसक्रीम की बिक्री भी बढ़ती है।

यह एक सहसंबंध हो सकता है।

लेकिन–

क्या आइसक्रीम की बिक्री बढ़ना गर्मी का अनिवार्य लक्षण है?

नहीं।

इसी प्रकार–

बादल और वर्षा
मोर और वर्षा
गर्मी और आइसक्रीम की बिक्री

इनके बीच संबंध हो सकता है लेकिन हर संबंध न्याय की कठोर अर्थवाली व्याप्ति नहीं है।

मूल पाठ में बादल–वर्षा के उदाहरण से इसी अंतर को स्पष्ट किया गया है।

19. व्याप्ति की स्थापना में अन्वय और व्यतिरेक का संयुक्त परीक्षण

अब तक की चर्चा को एक उदाहरण में समेटें।

प्रश्न:

पर्वत पर धुआँ देखकर अग्नि का अनुमान क्यों?

पहला चरण – अन्वय

जहाँ धुआँ है–

वहाँ अग्नि है।

दूसरा चरण – व्यतिरेक

जहाँ अग्नि नहीं–

वहाँ धुआँ नहीं।

तीसरा चरण – उपाधि की जाँच

क्या कोई ऐसी अतिरिक्त शर्त है जो इस संबंध को सीमित कर रही है?

चौथा चरण – व्याप्ति

यदि संबंध निश्चित और अनिवार्य रूप से स्थापित है–

धूम → अग्नि

पाँचवाँ चरण – पक्षधर्मता

पर्वत पर धूम विद्यमान है।

छठा चरण – परामर्श

पर्वत का यह धूम अग्नि से व्याप्त है।

सातवाँ चरण – अनुमिति

अतः पर्वत पर अग्नि है।

20. व्याप्ति, परामर्श और अनुमान: पूरा संबंध

इसे क्रमबद्ध रूप में देखें–

प्रत्यक्ष
पर्वत पर धुआँ दिखाई दिया।

↓

व्याप्तिज्ञान
जहाँ धुआँ है, वहाँ अग्नि है।

↓

पक्षधर्मता
पर्वत में धुआँ है।

↓

परामर्श
पर्वत में विद्यमान धुआँ अग्नि से व्याप्त है।

↓

अनुमिति
अतः पर्वत अग्निमान् है।

मूल सामग्री में प्रत्यक्ष → व्याप्ति-स्मरण → परामर्श → अनुमान की यही मूल प्रक्रिया दी गई है।

21. व्याप्ति की दार्शनिक विशेषताएँ

अब व्याप्ति के स्वरूप को संक्षेप में समझें।

1. निश्चितता

व्याप्ति केवल संभावना नहीं है।

2. अविच्छिन्नता

व्याप्ति में संबंध टूटना नहीं चाहिए।

3. अनिवार्यता

हेतु की उपस्थिति साध्य की उपस्थिति से आवश्यक रूप से जुड़ी हो।

4. सार्वत्रिकता

व्याप्ति किसी एक स्थान या एक घटना तक सीमित नहीं होती।

5. पक्ष-निरपेक्षता

व्याप्ति का संबंध केवल वर्तमान पर्वत तक सीमित नहीं है।

6. उपाधि-रहितता

ऐसी छिपी हुई शर्त नहीं होनी चाहिए जो कथित सार्वत्रिकता को सीमित कर दे।

22. व्याप्ति और अनुमान: एक समेकित उदाहरण

मान लें किसी दूरस्थ पहाड़ी से धुआँ उठता दिखाई देता है।

हमारा ज्ञान इस प्रकार विकसित होता है–

चरण 1:
“यह पर्वत है।”

चरण 2:
“पर्वत पर धुआँ है।”

चरण 3:
“जहाँ धुआँ है, वहाँ अग्नि है।”

चरण 4:
“पर्वत पर जो धुआँ है, वह अग्नि से व्याप्त है।”

चरण 5:
“अतः पर्वत पर अग्नि है।”

यहाँ सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि–

धुआँ प्रत्यक्ष हुआ, अग्नि अनुमित हुई और धूम–अग्नि का अनिवार्य संबंध व्याप्ति के रूप में कार्यरत रहा।

23. व्याप्ति का दार्शनिक महत्त्व

व्याप्ति को केवल अनुमान की तकनीकी परिभाषा मानना उसके दार्शनिक महत्त्व को कम कर देना होगा।

व्याप्ति के भीतर मूलतः यह प्रश्न निहित है–

क्या मनुष्य सीमित अनुभव से सार्वत्रिक और निश्चित ज्ञान प्राप्त कर सकता है?

इसलिए व्याप्ति की समस्या केवल न्याय दर्शन की समस्या नहीं बल्कि ज्ञानमीमांसा की एक गहरी समस्या है।

यह हमें तीन स्तरों पर सोचने के लिए बाध्य करती है–

अनुभव

हमने क्या देखा?

संबंध

देखी गई घटनाओं के बीच कौन-सा संबंध है?

सार्वत्रिकता

क्या वह संबंध प्रत्येक उपयुक्त परिस्थिति में अनिवार्य रूप से लागू होता है?

यहीं से व्याप्ति का वास्तविक दार्शनिक महत्त्व सामने आता है।

24. व्याप्ति, चार्वाक और न्याय: दार्शनिक संवाद

प्रश्नचार्वाक की चुनौतीन्याय की दिशा
व्याप्ति क्या है?सार्वत्रिक संबंध प्रत्यक्ष नहींनिश्चित सहचर्य
क्या कुछ उदाहरण पर्याप्त हैं?सार्वत्रिकता सिद्ध नहींकेवल पुनरावृत्ति पर्याप्त नहीं
अनुमान किस पर आधारित है?व्याप्ति परव्याप्ति पर
व्याप्ति कैसे जानी जाए?प्रत्यक्ष की सीमाअन्वय, व्यतिरेक, तर्क आदि से परीक्षण
उपाधि का क्या?सार्वत्रिकता को चुनौतीउपाधि-निरास आवश्यक
अनुमान की स्थितिनिश्चित ज्ञान पर आपत्तिप्रमाण के रूप में स्वीकृत

इस प्रकार व्याप्ति पर विवाद वास्तव में अनुमान की प्रमाणिकता के विवाद का केंद्र बन जाता है।

25. व्याप्ति की संपूर्ण ज्ञान-प्रक्रिया

अब पूरे अध्याय को एक ही प्रवाह में देखें–

अनुभव
↓
सहचर्य का निरीक्षण
↓
अन्वय
↓
व्यतिरेक
↓
उपाधि की जाँच
↓
तर्क द्वारा परीक्षण
↓
निश्चित व्याप्तिज्ञान
↓
पक्ष में हेतु का ज्ञान
↓
परामर्श
↓
अनुमिति

यही व्याप्ति की दार्शनिक यात्रा है।

26. व्याप्ति को समझने का सरल सूत्र

मूल सूत्र

हेतु जहाँ-जहाँ, साध्य वहाँ-वहाँ।

व्यतिरेक के साथ

साध्य जहाँ नहीं, हेतु वहाँ नहीं।

धूम–अग्नि

धूम → अग्नि
अग्नि-अभाव → धूम-अभाव

अनुमान का सूत्र

पक्ष में हेतु → व्याप्ति → परामर्श → साध्य का ज्ञान

मूल सामग्री में भी इसी प्रकार “हेतु जहाँ-जहाँ, साध्य वहाँ-वहाँ” तथा “साध्य जहाँ नहीं, हेतु वहाँ नहीं” को स्मरण-सूत्र बनाया गया है।

27. दार्शनिक सार

व्याप्ति को केवल “जहाँ धुआँ वहाँ आग” जैसी एक परिभाषा तक सीमित नहीं किया जा सकता। इसका वास्तविक दार्शनिक स्वरूप तब सामने आता है जब हम पूछते हैं–

धुआँ और अग्नि का संबंध इतना निश्चित क्यों माना जाए कि धुआँ देखकर अग्नि का ज्ञान हो सके?

इस प्रश्न का उत्तर हमें व्याप्ति की ओर ले जाता है।

व्याप्ति–

  • केवल सह-अस्तित्व नहीं है,
  • केवल सहसंबंध नहीं है,
  • केवल बार-बार देखे गए उदाहरणों का संग्रह नहीं है और
  • स्वयं अनुमान के समान भी नहीं है।

यह हेतु और साध्य के बीच निश्चित, अविच्छिन्न एवं अनिवार्य सहचर्य-संबंध है, जिसके ज्ञान के बिना न्याय का अनुमान अपनी तार्किक शक्ति प्राप्त नहीं करता। मूल पाठ भी व्याप्ति को इसी प्रकार अनुमान की आधारभूत शर्त मानता है और

इसीलिए व्याप्ति की समस्या केवल यह नहीं है कि–

“धुएँ से आग कैसे सिद्ध हुई?“

बल्कि उससे अधिक गहरी है–

“हमें कैसे पता चला कि धुआँ और आग के बीच ऐसा सार्वत्रिक और अनिवार्य संबंध है?“

यही प्रश्न व्याप्ति को न्याय दर्शन की एक केंद्रीय ज्ञानमीमांसात्मक समस्या बनाता है।

28. परीक्षा के लिए संक्षिप्त उत्तर

व्याप्ति न्याय दर्शन में हेतु और साध्य के बीच स्थापित निश्चित, अविच्छिन्न एवं अनिवार्य सहचर्य-संबंध है। यह अनुमान की आधारभूत शर्त है। जैसे–”जहाँ धुआँ है, वहाँ अग्नि है।” व्याप्ति की स्थापना में अन्वय और व्यतिरेक का महत्त्व है। केवल सह-अस्तित्व को व्याप्ति नहीं कहा जा सकता। व्याप्ति-ग्रहण में उपाधि तथा चार्वाक की आपत्ति महत्वपूर्ण दार्शनिक समस्याएँ हैं। व्याप्तिज्ञान के आधार पर पक्ष में हेतु का ज्ञान, परामर्श और अंततः अनुमान होता है।

अंतिम स्मरण-सूत्र

अन्वय → व्यतिरेक → उपाधि-परीक्षण → व्याप्तिज्ञान → पक्षधर्मता → परामर्श → अनुमान

These valuable are views on Theory of Invariable Concomitance | Invariable Concomitance | Vyapti Ka Siddhant
नियत सहचर्य का नियम | व्याप्ति का सिद्धांत


मानस जिले सिंह
【यथार्थवादी विचारक 】
अनुयायी – मानस पंथ, शिष्य – प्रोफेसर औतार लाल मीणा
उद्देश्य – मानवीय मूल्यों की स्थापना हेतु प्रकृति के नियमों का यथार्थ प्रस्तुतीकरण में संकल्पबद्ध योगदान देना।

www.sakshiyoga.org

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Latest