स्वयं से संवाद | अद्वैत में रहने की चाह
A Prayer to Myself | Man Ke Bhav | Snvany se Sanvad | Ek Virah Ka Bhav
|| Man Ke Bhav ||
जैसे-जैसे कुछ जानने की पिपासा बढ़ती चली गई,
मानो एकांत ही भाने लगा।
ये कैसी ज्ञान की यात्रा है,
जहाँ अपने ही वजूद को खोना
अब अच्छा लगने लगा है?
कहते हैं, ज्ञान सँवारता है,
निखारता है वह वजूद को;
तराशता है विवेक को –
पर यह क्या,
कुछ बनने की चाह नहीं,
बल्कि मिटने की चाह
बढ़ती ही चली गई।
गुरु कहते हैं –
मन में विचलन होना ही चित्तवृत्ति है;
धारणा करो किसी एक आकार की,
उसके स्वरूप में स्थित रहो
एक बिंदु पर;
ध्यान करते-करते
एक दिन समाधि लग जाएगी।
पर कौन बताए –
प्रकृति के प्रत्येक तत्त्व में
जब उसी का वास है,
तो अब उसके जड़ स्वरूप में भी
उसके जीवंत होने का आभास होने लगा है।
भावविह्वल होकर
अश्रु थमते ही नहीं,
और अंतर्मन की गहराई से
एक आवाज़ कानों में गूँजने लगी है –
“क्या चाहिए तुझे?”
हर बार होंठ खुले,
पर शब्द जन्म ही न ले सके;
और मैं
निशब्द होकर
मौन को ही
जीता चला गया।
फिर विवेक ने पूछा –
“माँगना भी किससे,
और माँगना क्या?”
जब माँगने वाला भी वही,
जिससे माँगूँ वह भी वही,
और जो माँगना है –
वह भी उसी का विस्तार;
तो फिर किस अभाव की बात करूँ?
बस,
हर इच्छा को
अश्रुओं में घोलकर
बहाता चला गया।
न कुछ माँगा,
न कुछ छोड़ा –
बस स्वयं को
उसी में खोता चला गया।
और जब स्वयं को खोजने निकला,
तो अंततः इतना ही जाना –
जिसे खोजता रहा उम्र भर,
वह मुझसे कभी अलग था ही नहीं।
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स्वयं से संवाद | अद्वैत में रहने की चाह
मानस जिले सिंह
【यथार्थवादी विचारक 】
अनुयायी – मानस पंथ, शिष्य – प्रोफेसर औतार लाल मीणा
उद्देश्य – मानवीय मूल्यों की स्थापना हेतु प्रकृति के नियमों का यथार्थ प्रस्तुतीकरण में संकल्पबद्ध योगदान देना।

